तेरी नित्य नयन की रंगत से,
फूलों सी महक महकती है।
पैरों में चोट लगे फिर भी,
हम हँस कर उसे विषर जाते हैं।
चली गई तू कहाँ कि मैं,
तुझे अब कहाँ तराशूँ मैं ?
एक ज़ख्म अभी भरता नहीं,
कि दूजा चोट बन जाता है।
अब तू ही बता कि ऐ सनम,
मैं तुझे कहाँ तराशूँ?
जब थी तू मेरे पास तो,
यूँ ही सब कुछ दिख जाता था।
जब से चली गई तू दूर कहीं,
हर जगह अंधकार ही दिखता है।
अब तू ही बता कि मैं,
तुझे अब कहाँ तराशूँ मैं ?
आईने में ढूँढा, तराशा बागों में,
कहीं भी न दिखी तू मुझको।
अब तू ही बता कि मैं,
तुझे और कहाँ तराशूँ मैं ?
तेरे शब्दों में लीन होकर,
तेरी बातें सबको सुनाता हूँ।
अब तू ही बता ऐ हमदम,
तेरे रंगीन शब्द कहाँ तराशूँ मैं?
कवि -एसटीडी मौर्य ✍️
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