जिने की तमन्ना में मार बैठे
कविता
जीने की तमन्ना में मर बैठे
जब से तुमसे प्यार हुआ हम हार बैठे
क्या करूं मैं इस दिल का
जो तुम पर मरने लगा है
हर वक्त बातें तुम्हारे करने लगा है
होठ खामोश है दिल दर्द से भरा
तुम्हें सामने पा कर भी
तुम्हें पाने का ख्वाब
दिल में हर पल रहता है
तो
चाहा आज तुम सामने हो
तो क्यों ना
मैं तुम्हारे और पास आऊ
और कहूं
दिल में जो है
कहूं मैं तुम्हें
जीने की तमन्ना में हम मर बैठे
जब से तुमसे प्यार हम हार बैठे
कहां मैं तुम्हें मैं
हार गया अपने दिल से
जब से तुम मेरे दिल में आए
कहो मैं तुम्हें
मैं जीना चाहती हूं
पर तुम्हारे साथ जीने की तमन्ना में
मैं मर रही हूं
और
पूछूं मैं तुम्हें क्या तुम भी मुझसे प्यार करोगे
और
पूछो मैं तुम्हें क्या मैं तुम्हें कभी पसंद आई
पर मैं तुम्हारे सामने आकर
यह नहीं कह पाए
कि मैं तुमसे प्यार करती हूं
मुझ में हिम्मत नहीं
अपनी इश्क को जाहिर करने की
और यह दर्द गहरा है
कहां हूं मैं तुम्हें कभी मेरी चमकती हुई
आंखें क्या देखा है
जो तुम्हें देखकर ही चमकता है
कहूं मैं तुम्हें क्या तुमने मेरी रोती हुई
आंखों देखा है
जो तुमसे रूबरू ना होने के गम में बहता है
और पूछो मैं तुम्हें क्या
तुमने कभी मेरी मुरझाई हुई चेहरा देखा है
तुम्हें अपना मान के भी
तुम्हें अपना ना कहने के दर्द में
मेरे चेहरे से रौनक उतर गई है
पर मुझ में हिम्मत नहीं
तुम्हारे पास जाओ
और कहूं दिल की बात अपने
पर मैंने हमेशा देखा है
तुम्हें तुम्हारी जिंदगी जीते हुए
तुम्हारी तनहाई को तुम्हारी सादगी को
तुम्हारे दर्द को तुम्हारे अकेलेपन को
तुम्हारे हंसते हुए चेहरा
तुम्हारी मुरझाए से चेहरा
मैं ने हर बार देखा है
तुम्हारे गमों को मैंने खामोशी से अपने अंदर पना दिया है
अगर यह कविता आपसे लगे तो
आगे पढ़ते रहि
मैं आपके प्रिय लेखक अभी निशा ❤️🦋💯