कच्चा घर
कच्चा घर था, छोटा सा,
पर अपना-सा, सच्चा सा।
दीवारों में प्यार बसा,
माँ का आँचल, छाया-सा।
छत टपकी बरसातों में,
हँसते थे हम रातों में,
बर्तन रख-रख भूल गए,
दुख क्या है उन बातों में।
टूटा-फूटा, साधारण था,
फिर भी सबसे न्यारा था,
कच्चा घर वो मिट्टी का,
दिल से बहुत हमारा था… 🌧️