“शब्दबाण"
जोश-जोश की बात थी,
बात में आग पर जली राख थी।
अंजाम की फ़िक्र से अनजान,
वह बात तो अमित घाव थी।
एहसास के होने तक,
काम हो गया,
दिल का दर्द बयान हो गया,
शब्दों का माया जाल हो गया,
शस्त्र से ज़्यादा आघात हो गया।
था जो धनुष से निकल गया,
एक तीर ही था,
पर लक्ष्य अनेक छेद गया।
Written by: Sneha Gupta