चोट लगती रही, मुस्कराते रहे।
जिंदगी इस तरह, हम बिताते रहे।।
घर हमारा रहा, पर अतिथिगण बहुत।
देव कहकर अतिथि मन रिझाते रहे।।
दर्द से ही बनें मित्र रिश्ते सदा।√
दूर से बस हमें सुख लुभाते रहे।।√
घर अभावों का था पर्वत सा खड़ा।
प्रभु जी फिर भी कृपा बरसाते रहे।।
एक जुट रखना था बस परिवार को।
दीप-त्यौहार मिल-जुल मनाते रहे।।
नेह के उन पलों को न भूले कभी।
याद आकर हमें वे रुलाते रहे।।
खो गया वह समय क्यों दिखता नहीं।
प्रेम की गंग में सब नहाते रहे।।
मनोजकुमार शुक्ल मनोज
12/6/26