"सपने"
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फर्श पर बिखरी
ठंडक
रात
आंखे भींच गई।
नीली बूंद टपक रही हैं
किसी ने नल खुला छोड़ा
उठ नहीं सकता
दिन का बोझ ढोती नदी
उतर रही है समुद्र में।
ये कौन प्रदेश
कैसी भूमि पर
नंगे पैर चल रहा
भारहीन शरीर।
सलून की दुकान
आईने लगे हुए
उसमें प्रतिमा नहीं
क्या मैं खो गया हु।
ये झाग
सेविंग क्रीम
गालों पर रगड़ता
हुआ आदमी,
किसके गाल है
ये
इतने विशाल
मुख के भीतर
कितनी सीढ़ियां लगी है
श्रुति, वेद, प्रकाश, अंधकार भी
हर पायदान से होता हुआ
नीचे ऊपर कर रहा है,
कितने मृत
कितने जीवित प्राणी
समा रहे उस मुख के अंदर।
उसकी दाढ़ी खत्म
वह काम पर निकला है
उसकी टिफिन में
चांद या सूरज घूम रहे हैं।
क्या ये सपना है
नहीं
शायद हां,
वाकई ये दुर्लभ सपना है।
मैं पूरी तरह से जानता हूं
कि, मेरी ही निद्रा में
मैं जाग रहा हु।
भूमि बदल गई
कोई प्यास से बुझ रहा
भूख से बिलग रहा
जीव भी
शायद अमीबा है
इसकी मृत्यु नहीं
इसका विभाजन होता
मैं देख रहा हु।
फिर जमीन बदल गई
यहां कोई केंद्र नहीं
मैं जहां खड़ा हु
शायद वही केंद्र है
या मैं जहां नीद से भरा
पड़ा हु वह भी केंद्र हो सकता है
विस्फोट हर जगह हो रहे है
हर धमाके में
एक नया केंद्र उभर रहा है।
भूमि फिर खिसक गई
या शायद मैं ही
अपने ही भीतर
सरक गया।
एक आवाज थी
बहुत दूर से आती हुई
जैसे कोई नाम पुकार रहा हो
पर वह मेरा नाम नहीं था।
कानों के भीतर
कुछ दरवाज़े खुले
और बंद हो गए
बिना हवा के।
मैंने हाथ बढ़ाया
तो उंगलियों से
रेत नहीं
समय झरने लगा।
घड़ी कहीं नहीं थी
पर टिक-टिक
हड्डियों में हो रही थी।
एक बच्चा दिखा
मेरे सामने
वह रो नहीं रहा था
बस देख रहा था मुझे
जैसे वह जानता हो
मैं अभी टूटने वाला हूँ।
उसने मुट्ठी खोली
उसमें एक छोटा सा
अधूरा ग्रह था
जिस पर
आधी रोशनी
आधा अंधेरा अटका हुआ था।
मैंने उसे छूना चाहा
तो वह बच्चा
अचानक वृद्ध हो गया
और उसकी आँखों में
हजारों जन्मों की थकान
इकट्ठी थी।
वह बोला नहीं
पर उसके होंठ हिले—
“तुम हर बार यहीं आते हो।”
मैं पीछे मुड़ा
तो वही सलून
पर अब आईनों में
चेहरे थे—
सभी मेरे
पर कोई भी मैं नहीं।
एक चेहरा हँस रहा था
एक रो रहा था
एक बस खाली था
और एक
धीरे-धीरे मिट रहा था।
मैंने एक को पकड़ना चाहा
तो पूरा आईना
पानी बन गया
और मैं उसमें
डूबने लगा।
नीचे कोई तल नहीं था
सिर्फ गिरना था
और गिरते हुए
मैंने देखा—
अमीबा अब
ग्रह बन चुके थे
और ग्रह
फिर से
कोशिकाओं में बंट रहे थे।
जीवन और मृत्यु
एक ही धड़कन के
दो किनारे नहीं थे
बल्कि
एक ही वृत्त के
घूमते हुए बिंदु थे।
फिर अचानक
सब कुछ रुक गया।
ना आवाज
ना गति
ना विचार।
सिर्फ एक बिंदु—
इतना सूक्ष्म
कि उसमें
पूरा विस्तार समा जाए।
मैंने सोचा
यही केंद्र है।
पर जैसे ही सोचा
वह बिंदु फट गया।
और उसके भीतर से
अनगिनत “मैं”
बाहर गिरने लगे—
हर एक अलग
हर एक अधूरा।
मैंने उनमें से एक को
पहचानने की कोशिश की
पर तभी—
आंखें खुल गई।
फर्श अभी भी ठंडा था
नल अब भी टपक रहा था
और रात
अब भी अधूरी थी।
मैं उठा नहीं
बस लेटा रहा
और पहली बार
मुझे लगा—
शायद
मैं अभी भी
सपने में किसी अज्ञात
सपने को कंधे पर लादे
चल रहा हु।
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