"तमस"
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गूंगा होना कोई विकल्प नहीं,
अंधा
या बहरा होना भी नहीं।
लेकिन जब गाड़ी फँस
जाती है कर्ण की तरह
किसी सड़क के गड्ढे में,
तब फोटो क्यों नहीं लिया जाता?
बस चलान काटने के लिए ही
ये सिस्टम है क्या?
उस शापित वक्त में
नागरिक ही नहीं,
बल्कि सत्ता भी
अंधी, गूंगी या बहरी हो जाती है।
पता है कि
रात में फूटे स्ट्रीट लाइट
प्रकाश का दान देने में
असमर्थ हैं,
फिर भी इंद्र
ऐरावत पर घूमते हैं।
उन्हें चाहिए,
किसी भी हाल में
दान
या मतदान।
टेबल के नीचे
हरी घास उगती है—
अब वह नीली हो गई है
जैसे रक्त ने
अपना रंग बदलने से
इंकार कर दिया हो।
नीलापन
सिर्फ आसमान का नहीं होता,
वह घावों में भी उतरता है—
धीरे-धीरे,
बिना आवाज़ के।
और हम—
जो गूंगे नहीं हैं,
फिर भी बोलते नहीं,
अंधे नहीं हैं,
फिर भी देखते नहीं,
बहरे नहीं हैं,
फिर भी सुनते नहीं—
हम किस श्रेणी में आते हैं?
शायद
हम वही हैं
जो हर दिन
अपने भीतर की अदालत में
खुद को बरी कर देते हैं।
सड़क के गड्ढे
सिर्फ डामर नहीं तोड़ते,
वे समय को भी चीरते हैं—
जहाँ
हर गिरती हुई गाड़ी के साथ
एक भरोसा मरता है।
और उस क्षण
कोई कैमरा नहीं खुलता,
कोई सबूत नहीं बनता—
बस
एक और कहानी
अधूरी रह जाती है
किसी फ़ाइल के कोने में।
इंद्र के रथ के पहिए
कीचड़ में नहीं धँसते,
क्योंकि
उनके रास्ते
पहले से साफ़ कर दिए जाते हैं—
हमारे हिस्से की
धूल से।
दान और मतदान के बीच
जो अदृश्य पुल है,
वहीं
सबसे अधिक लेन-देन होता है—
जहाँ
उँगलियों पर लगी स्याही
धीरे-धीरे
नसों में घुल जाती है।
और तब
लोकतंत्र
एक शब्द नहीं रहता,
वह
एक थकी हुई देह बन जाता है
जिसे हर पाँच साल में
जगा कर
फिर से सुला दिया जाता है।
मैं पूछता हूँ—
क्या सच में
गूंगा होना विकल्प नहीं है?
या
यह सबसे सुरक्षित विकल्प है
इस समय में?
जहाँ
सवाल पूछना
सबसे बड़ा अपराध है,
और
चुप रहना
सबसे बड़ी
कमजोरी।
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Anup Ashok Gajare