Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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|| बचा हुआ — विस्तार ||
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हम गहरे नीले रंग के उस कमरे में रहते हैं
जहाँ दीवारें सिर्फ दीवारें नहीं,
अंतर की नमी से भीगी हुई स्मृतियाँ हैं—
और छत पर टंगा सन्नाटा
धीरे-धीरे श्वास लेता है।

पुंज-पुंज आलोक
सरस्वती की ध्वनि की तरह नहीं,
बल्कि उस अधूरे उच्चार की तरह है
जो जन्म लेने से पहले ही
मन की शिराओं में बहने लगता है—
एक ऐसा संगीत
जिसे कोई सुनता नहीं,
फिर भी सब उसी में डूबे हैं।

बाहरी दुनिया और भीतरी दुनिया के बीच
अब कोई रेखा नहीं बची—
रेखाएँ थीं भी तो
हमने उन्हें छू-छूकर मिटा दिया,
या शायद वे खुद ही
हमारी उपस्थिति से लुप्त हो गईं।

सब अपने हैं—
पर यह अपनापन
भीड़ का नहीं,
एक गहरे अकेलेपन का विस्तार है,
जहाँ हर चेहरा
हमारी ही छाया का दूसरा रूप बन जाता है।

रोग, शोक, मृत्यु—
क्या वे सच में हमें छूते नहीं?
या हमने ही
अपने स्पर्श को इतना भीतर खींच लिया है
कि बाहरी आघात
अब सतह तक पहुँच ही नहीं पाते?
गुलाब की पंखुड़ियाँ
अब रंग नहीं छोड़तीं,
रजनीगंधा की खुशबू
सिर्फ एक स्मृति बनकर रह गई है—
जैसे किसी पुराने जन्म की
भूली हुई भाषा।

दर्द और खुशी—
ये दो नहीं,
एक ही वृत्त के
अलग-अलग बिंदु हैं
जो निरंतर घूमते हुए
हमारे भीतर
एक ही केंद्र की ओर लौटते रहते हैं।

हमारा मर्म—
कोई स्थिर सत्य नहीं,
बल्कि एक शिल्प है
जिसे हम हर क्षण
थोड़ा-थोड़ा काटते, घिसते, तराशते हैं—
और अंत में
वही हमें गढ़ देता है।

हमने यह तय किया था—
बिना किसी संवाद के,
बिना किसी साक्षी के—
कि जीवन को
ऐसे ही बहने देंगे,
जैसे एक नदी
अपना मार्ग खुद ही भूल जाए
और फिर भी
समुद्र तक पहुँच जाए।

किसी से पूछा नहीं—
क्योंकि प्रश्नों में
हमेशा एक बाहरी दृष्टि होती है,
और हमने
अपने भीतर की दृष्टि को ही
एकमात्र सत्य मान लिया।

यह सब लेकर
बीत जाएगा हमारा जीवन—
धीरे-धीरे,
बिना किसी उद्घोष के,
जैसे समय
अपने ही पदचिन्हों को
मिटाता हुआ चलता है।

गहरा नीला रंग—
अब एक रंग नहीं,
एक अवस्था है,
जहाँ प्रकाश भी
अंधकार के भीतर जन्म लेता है।

और सरस्वती का वह संगीत—
अब शब्दों में नहीं,
बल्कि उस मौन में बसता है
जहाँ कुछ भी कहा नहीं जाता,
पर सब कुछ
सदैव कहा जा चुका होता है।
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Anup Ashok Gajare

Hindi Poem by Anup Gajare : 112021408
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