अनकही पीड़ा।
तुम न समझ सके कभी मेरी बेचैन निगाह,
मेरी तन्हाई की गहराई, ना जाने कोई नज़र।
मैं देखूँ तुम्हारी आँखों में मुस्कान की रौनक,
पर समझ न सके मेरे उदास मन की नज़र।
मेरी खामोशी पर तुम मुस्कुराती हो सदा,
पर न समझ न सके मेरे टूटे मन की नज़र।
मैंने जताई कितनी बातें तुमसे चुपके से,
फिर रह गईं अनसुनी मेरी आहों की नज़र।
तुम चाहो कि मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँ,
पर न समझ न सके मेरे जज़्बातों की नज़र।
मैंने सहा हर दर्द, हर तन्हाई अपनी,
‘प्रसंग’ न देख सके कोई गहराई की नज़र।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर