।। कोई आईना था? ।।
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मैंने कई बार
खुद को पुकारा—
नाम लेकर नहीं,
बस उस खालीपन से
जहाँ आवाज़ गिरकर
लौटती नहीं।
चेहरा
मेरे पास था शायद,
पर पहचान—
वह कहीं रास्ते में छूट गई,
जैसे भीड़ में
अपनी ही उँगली छोड़ देता है कोई बच्चा।
चाँद आज
फिर अलग-अलग जगहों पर टूटा पड़ा है—
कहीं बैंगनी सड़न की तरह,
कहीं पीला,
जैसे पुराने कागज़ पर पड़ी धूप,
और कहीं—
एक हरा,
जो आँखों में नहीं
सिर्फ डर में उगता है।
पर जो सफेद है—
वह कहीं नहीं दिखता।
शायद
सच्चाई हमेशा
दूर के छोटे कस्बों में मरती है,
जहाँ कब्रें
नाम नहीं रखतीं।
मैं
समय के अंदर चला गया था—
घड़ियाँ वहाँ पेड़ थीं,
और हर सेकंड
एक पत्ता बनकर
मेरे कंधों पर गिर रहा था।
मैंने एक घंटा सुना—
वह प्रेम नहीं था,
वह ठंड थी,
इतनी गहरी
कि धड़कन भी
अपने अर्थ भूल जाए।
हवा
आज कुछ लेकर नहीं आई—
वह गर्भवती थी
पर जन्म नहीं हुआ,
बस छायाएँ थीं
जो आधी बनीं
और वहीं सड़ गईं।
एक चिड़िया गा रही थी—
या शायद
वह सिर्फ
मेरे अंदर की गूँज थी,
जो बाहर आकर
अपने ही अस्तित्व पर शक कर रही थी।
मैंने आईने ढूँढे—
पर जो मिला
वह सिर्फ प्रतिबिंब का भ्रम था।
मेरी अंगूठी—
वह कभी थी ही नहीं,
फिर भी
उसका खोना
इतना सच्चा क्यों लगा?
क्या हम
सिर्फ उन्हीं चीज़ों के लिए रोते हैं
जो नहीं होतीं?
क्योंकि जो होती हैं—
वे सह ली जाती हैं।
तुम—
शायद मिली थी,
या मैं ही
तुम्हें गढ़ता रहा
अपने भीतर के खाली हिस्सों से।
तुम्हारे बाल
किसी समय-नदी की तरह थे,
और मैं
हर लहर में
अपनी ही डूबन देखता रहा।
हम
पास थे—
इतने कि साँसें टकराती थीं,
पर पहचान—
वह दोनों के बीच
मर चुकी थी।
मेरे भीतर
कुछ रेंगता है—
वह दर्द नहीं,
वह याद भी नहीं,
वह कुछ ऐसा है
जो हर पुराने स्पर्श पर
जाग जाता है।
और तुम कहती हो—
"हम अभी पैदा नहीं हुए।"
तो यह सब—
यह स्पंदन,
यह टूटना,
यह खोज—
किसकी है?
मैं
हर शाम
खुद को खत्म करता हूँ,
और हर सुबह
कोई और
मेरे भीतर जागता है।
लोग
मेरे सीने से गुजरते हैं—
जैसे मैं कोई रास्ता हूँ,
कोई ठहराव नहीं।
सब कुछ
फैल गया है—
दिशाएँ, अर्थ, स्मृतियाँ—
सब एक चौराहे में
घुल गए हैं।
और अंत में
कुछ भी नहीं बचा
सिवाय इस एहसास के—
कि
आईना न मिलना
एक हादसा नहीं था।
वह एक संकेत था—
कि
जो मैं ढूँढ रहा था,
वह देखने की चीज़ नहीं थी।
वह
शायद
कभी था ही नहीं।
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Anup Ashok Gajare