|| यह सुंदर नहीं है — भीतर का तट ||
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ट्रेन
अब भी चल रही थी—
पर उस क्षण
कुछ मेरे भीतर उतर गया था,
जैसे कोई शब्द
अपना अर्थ बदल देता है
अचानक।
मेरे बगल में बैठा वह बच्चा
अब सिर्फ बच्चा नहीं था—
वह एक दर्पण था,
जिसमें
मैं पहली बार
अपनी आँखों की थकान देख रहा था।
समुद्र
बाहर फैला हुआ था—
अनंत, विशाल,
पर उसके “यह सुंदर नहीं है” के बाद
वह सिकुड़ गया
एक सवाल में।
कितनी बार
मैंने चीज़ों को सुंदर कहा है—
बिना देखे,
बिना महसूस किए,
सिर्फ इसलिए
क्योंकि शब्द तैयार थे
और मैं खाली।
वह बच्चा
अब खामोश था,
पर उसकी खामोशी
मेरे भीतर बोल रही थी—
जैसे कोई पुराना दरवाज़ा
धीरे-धीरे खुल रहा हो।
मैंने खिड़की से बाहर देखा—
पर इस बार
समुद्र नहीं दिखा,
दिखा
अपना ही प्रतिबिंब
जो हर लहर के साथ
टूट रहा था।
सुंदरता
शायद हमेशा से
वहाँ नहीं थी—
वह तो
हमारी सहमति में थी,
हमारे डर में,
हमारे उस आग्रह में
कि सब कुछ ठीक है।
और सच—
सच शायद उतना विशाल नहीं होता
जितना समुद्र,
पर वह गहरा होता है
इतना कि
एक छह साल का बच्चा
उसे बिना डरे कह देता है।
ट्रेन आगे बढ़ गई,
तट पीछे छूट गया,
पर वह वाक्य
अब भी मेरे साथ है—
जैसे कोई छाया
जो रोशनी से नहीं,
अंदर के अंधेरे से बनती है।
और अब
जब भी मैं कुछ देखता हूँ—
मैं ठहर जाता हूँ,
थोड़ा डरता हूँ,
और सोचता हूँ—
क्या यह सच में सुंदर है,
या
मैं फिर से
झूठ को नाम दे रहा हूँ।
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anup ashok gajare