“अधूरे हिसाबों में हूं”
ए सच कहूं कि आजकल मैं मुश्किलों में हूं,
बस खाली ये वक़्त गुज़रने के प्रयासों में हूं।
कभी हौसला था जो आसमां को छू लेने का,
वो बिखरे हुए एहसासों की टूटी किताबों में हूं।
न रास्ता कोई साफ़ है, न ही मंज़िल का पता,
मैं धुंधले से सफ़र और अधूरे हिसाबों में हूं।
कभी जो अपने थे, वही अब अजनबी से हुए,
मैं रिश्तों की भीड़ में सबसे तन्हा नक़ाबों में हूं।
न अब शिकवा, न शिकायत किसी मोड़ पर,
बस अपने सवालों के अनसुने जवाबों में हूं।
कभी रोशनी थी, वो भी अब सिमट सी गई,
मैं अंधेरों के शहर और खामोश सराबों में हूं।
मैं अपनी ही कहानी का टूटा हुआ हूं, “प्रसंग”,
हर मोड़ पर बिखरा मगर फिर भी यादों में हूं।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर