।। …समय के उस पार, जहाँ हम बचे रह जाते हैं… ।।
हम
अब भी मिलते हैं—
चाय के उन्हीं कपों के बीच,
जहाँ बातचीत नहीं,
आदतें बैठती हैं आमने-सामने।
तुम्हारे भीतर
अब भी एक ऋतु बची है—
हर साल
किसी नए नाम से लौट आती है,
जैसे मिट्टी
अपनी जली हुई स्मृतियों के बावजूद
बीज स्वीकार करना नहीं भूलती।
और मैं—
मैं उस मिट्टी का हिस्सा नहीं रहा,
मैं वह राख हूँ
जिसे हवा भी
छूने से पहले हिचकती है।
मेरे भीतर
उगने से पहले ही
हर संभावना
स्मृति बनकर जल उठती है।
तुम्हें वही जगहें प्रिय हैं—
वही मेज़,
वही पगडंडियाँ,
वही ठहरे हुए दृश्य—
जहाँ तुम हर बार बदलते हो,
पर दुनिया तुम्हें पहचानती रहती है।
और मैं…
मैं हर दृश्य से
थोड़ा-थोड़ा बाहर गिरता गया,
इतना कि अब
कोई भी जगह
मुझे पूरा स्वीकार नहीं करती।
हम फिर भी चलते हैं साथ—
घास के बीच,
उन पहाड़ियों की ओर
जहाँ हवा
पुराने शब्दों को भी
नई आवाज़ दे देती है।
तुम्हारा शरीर
अब भी पीड़ा से भरा है—
पर वह पीड़ा तुम्हें तोड़ती नहीं,
बस तुम्हारे भीतर
और गहरा फैल जाती है।
और मैं
धीरे-धीरे यह समझने लगा हूँ—
कि जीवन
सिर्फ जीने का नाम नहीं,
बल्कि बार-बार
मरकर लौट आने की एक आदत भी है।
कुछ लोग
हर बार जी उठते हैं—
सिर्फ फिर से मरने के लिए…
और कुछ—
एक ही बार मरकर
समय के उस पार
लंबे समय तक
चलते रहते हैं…
जैसे अपनी ही अनुपस्थिति को
जीते हुए।