मैं और मेरे अह्सास
पैसे
इन्सान की कीमत नहीं पैसा ही पहचान हैं l
जग में रिश्तों की अहमियत से अनजान हैं ll
किसीके लिए नहीं रुकता चलता रहता है l
बात ये जान लो कि वक्त बड़ा बलवान हैं ll
समय का चक्र चलता जाता इतराता न फ़िर l
चार पैसे से नवाज़ा तो ईश का अहसान हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह