"कभी-कभी आईने के सामने खड़ी होकर,
खुद को गौर से देखती हूँ...
तो सवाल मन में एक अजीब सी हलचल मचाता है—
क्या मैं वही हूँ?
जो हर छोटी बात पर सबसे रूठ जाया करती थी,
जो खाने में नखरे करती थी, अगर सब्जी मन की न होती थी।
आईने ने मेरी आँखों में झाँककर मुस्कुराते हुए कहा—
'हाँ, तू वही है...
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बस अब तेरी उन नखरों वाली जगह पर,
दूसरों की ज़िम्मेदारियों ने घर कर लिया है।'"