उसने पूछा
क्या करते हो-
मैंने कहा बाग में
कोयल की कू - कू सुन लेता हूँ,
जंगल में
शेर की दहाड़ सुन लेता हूँ,
योग में
योगासन कर लेता हूँ,
खेत में
अन्न उगा लेता हूँ,
पहाड़ चढ़ लेता हूँ,
सुरीले संगीत में
खो जाता हूँ,
प्रकृति का सान्निध्य लेने
शहर से बाहर चला जाता है,
लम्बे-लम्बे खोखले भाषणों से
मुक्त हो जाता हूँ,
वृक्ष के फूल सा खिला
फल बनने की सोचता हूँ,
पूरब की आभा ले
पश्चिम से निकल जाता हूँ।
*** महेश रौतेला