मैं दुर्गा, मैं ही अंबा हूँ,
मैं ही महाकाली, मैं ही जगदंबा हूँ।
पर तुम मेरी मजबूरियाँ सुनो,
एक नहीं, अनगिनत कहानियाँ सुनो।
मैं जोर से हँस भी सकती नहीं,
मैं बाहर टहल भी सकती नहीं।
मेरे होंठों पर मरुस्थल की खामोशी है,
मेरी आँखों में सपनों की नाकामी है।
तुलसी के क्यारे में सिमट कर रह गई,
अपनी ही अस्मिता की प्यास मैं सह गई।
जो आग मुझमें दुनिया को जला सकती है,
वही आज मेरी आँखों में आँसू बनकर बह गई।
शक्ति का प्रतीक मानी जाने वाली नारी, जब अपने ही घर में एक कैदी बन कर रह जाए, तो वह 'देवी' नहीं, एक 'अनकही टीस' बन जाती है। क्या आज भी नारी की मर्जी उसके अपने वजूद से ज्यादा मायने रखती है? अपने विचार कमेंट्स में रखें। 🥀
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