कुछ बेटियाँ मार दी जाती हैं गर्भ के अंधियारे में,
कुछ घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर कर दी जाती हैं।
जो बच जाती हैं अपनी जान बचाकर इस भीड़ में,
वो डिप्रेशन की शक्ल लेकर, या पागल होकर ठहर जाती हैं।
समाज का ये कैसा न्याय है, कैसा ये क्रूर विधान है?
जहाँ जीने के अधिकार पर भी, पहरेदारों का फरमान है।
वो जो हंसना चाहती थी, अब खामोश बैठी है,
वो जो उड़ना चाहती थी, अब खुद में ही सिमटी है।
यहाँ आपकी भावनाओं को विस्तार देते हुए:
न कोई चीख सुनता है, न कोई आह समझता है,
इस अंधे समाज का हर शख्स, बस अपनी मर्यादा रटता है।
जो बच गई हैं, वो ज़िंदा लाशें बनकर जी रही हैं,
अपनों के दिए घाव, हँसकर नहीं, पी रही हैं।
कैप्शन: किसी का गला घोंटना ही हिंसा नहीं है, किसी को तिल-तिल कर मरने के लिए मजबूर कर देना भी उतना ही बड़ा अपराध है। हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ एक स्त्री को 'सही' बने रहने के लिए अपना मानसिक सुकून तक दांव पर लगाना पड़ता है। क्या हम वाकई इतने असंवेदनशील हो गए
हैं? 🥀🕯️
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