Hindi Quote in Poem by AbhiNisha

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ऐ तुम्हें देखकर अब डरने लगी हूं मैं

पर मैं हमेशा के लिए वैसी नहीं रह सकती
कविता पार्ट 3


पर
और सच यह है कि
पर मैं वैसे नहीं हूं
मैं खुद को अच्छी तरह से जानती हूं
मैं गिरूंगी तो फिर उठूंगी
मैं जानती हूं दरिंदा शायद घर के दिवारीयों में भी मिल सकता है

अभी मेरी मन की स्थिति ऐसी है
मैं हमेशा इस तरह से नहीं रह सकती

मैं जानती हूं
मैं एक बार इन सब से बाहर आ चुकी हूं
और दोबारा आ जाऊंगी
अंधेरा हमेशा के लिए नहीं होता


और मैं क्यों किसी की नजरों से घबरा कर
खुद को कमरे में बंद करु

क्यों मैं समाज के सोच से डर कर
अपने पैर में बेरिया लगा लु

चाहे जो भी हो जाए
मैं सपना देखती रहूंगी
और एक आजाद आत्मा बनकर
दौड़ूंगी भागूंगी सीखुगी पढ़ूंगी जानुगी सोचूंगी

और तो और इस दुनिया को अनुभव करूंगी

मैं एक बार इन सब को झेल चुकी हूं
और बाहर आई हूं

और दोबारा भी मैं ईन सबसे बाहर आ जाऊंगी
मैं आजाद आत्मा
खुद को पूरी तरह से जंजीर मे जकरने केसे दुं


मैं औरो से
मैं थोड़ी अजीब हूं
मैं हर बार एक जगह नहीं ठेहेर सकती

मैं आजाद ख्यालों की लड़की बलखाती हवा की तरह दौड़ती मैं पिंजौर में अपनी जिंदगी कैसे बिता दूं


मैं क्यों डरूं क्यों भागूं खुद छुपाए फिरते
इस समस्या और इस समाज के नजरों से
खुद को क्यों कैद कर लूं मैं चार दिवारीयों में


गलती उन नजरों की जो मुझे बुरी नजरों से देखा है
गलती उन समाज के लोगों की जो
मुझे हर वक्त जज करता है

मेरी तो नहीं

तो मैं क्यों गिल्टी फील करूं
और हमेशा के लिए पांव में बेड़िया पहेन लू

और खुद को छुपा लूं
परदो के पीछे लंबी घूंघट टेंते हुए
यह सोचकर की यही मेरा भाग्य है

कैसे मान लो कि यह मेरा भाग्य है
जबकि यह दुर्भाग्य है

बस एक जगह ठहेर जाना
अपने सांसे गिरवी रख देना है


और मैं सूरज से निगाहें मिलाकर सूरज को तकने वाली
नजरे झुकते हुए घर के अंदर कैसे चली जाऊं


कैसे ना लड़ु में फिर से अपनी वजूद के लिए
कैसे ना जुबान खोलो मैं
अपने होने की पहचान के लिए


कैसे अपने दुर्भाग्य को अपने भाग्य बनने लु
मुझे हर वक्त मार कर बस सांस नहीं लेना है
समाज की बताई गई हिसाबसे

मुझे सांस लेते हुए जीना है
समाज की हिसाब से आगे बढ़कर

मुझे जीना भी है और खुश भी रहना है
पितृ सट्टा वाली सोच के गाल पर जोरदार समाचार मार कर

मुझे बस आगे बढ़ते रहना है
चाहे मेरी कभी-कभी चाल धीमी हो जाए

फिर भी मुझे नहीं रुकना
रुकना मेरी जिंदगी को कम करता है
और चलना मेरी जिंदगी को और लंबी


मैं अल्हड़ पुरवाई बस वेहते रहना चाहती हूं

Hindi Poem by AbhiNisha : 112026283
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