"धर्मवीर भारती की किताब 'गुनाहों का देवता' चन्दर और सुधा की एक ऐसी ही अधूरी और बेबस मोहब्बत की दास्तान है, जहाँ समाज, आदर्शों और कायरता के बीच एक पवित्र रिश्ता दम तोड़ देता है। यह लाइन उस दर्द की पराकाष्ठा है। जब दो लोग मोहब्बत करते हैं, तो दोनों का समर्पण बराबर होना चाहिए। लेकिन जब वक़्त की कसौटी आती है, समाज की दीवारें सामने खड़ी होती हैं, और उनमें से कोई एक कायर निकल जाता है—लड़ने के बजाय घुटने टेक देता है या पीछे हट जाता है—तो नुकसान सिर्फ उस रिश्ते का नहीं होता। दूसरा इंसान, जिसने अपनी पूरी कायनात उस प्यार को मान लिया था, वो अंदर से पूरी तरह टूट जाता है। वो जीता तो है, लेकिन उसकी रूह हर रोज़ बे-मौत मरती है।
"मोहब्बत निभाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। वादे करना आसान है, लेकिन जब उन वादों को निभाने के लिए दुनिया से, हालात से या खुद से लड़ना पड़े, तब इंसान की असलियत सामने आती है। प्रेम में कायरता सबसे बड़ा गुनाह है। जो लोग मुश्किल वक़्त में हाथ छोड़ देते हैं, वे कभी सच्चे प्रेमी नहीं हो सकते। हाँ, किसी एक के पीछे हट जाने से दूसरा इंसान पूरी तरह बिखर जाता है, लेकिन यही बिखराव कभी-कभी उसे अंदर से बेहद मज़बूत भी बना देता है।