"...शक..."
वह आज भी आई थी
गुलाबी फूलों का सलवार पहने।
हमेशा की तरह चलते हुए
भींची मुट्ठियां जिनमें
पता नहीं क्या भरा हुआ रहता है
डर?
नहीं, वह डरपोक नहीं है
पर लड़की है
लड़की जिसे मैं कबूल कर चुका हु
एक तरफा
उसने भी कबूल किया है
एक तरफा
हम बोलते नहीं
शब्द
बिना शब्द, अक्षर वाक्य बुने भी
बहती रहती है मुहब्बत हवा में।
तो आज उसे क्या हुआ
निगाहों में इतनी बेचैनी क्यों है?
कही किसी नुक्कड़ पर
या चाय के ठेले से
सिसकती गलियों में दुबके हुए
कोई दूसरा उसे चाह तो नहीं रहा
एक तरफा....
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