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।। …सूखे की देह में बचा हुआ मनुष्य… ।। तुम जब भी आते हो— अपने साथ महुआ नहीं, सूखे की एक लंबी दरार ले आते हो। तुम्हारी हथेलियों पर इमली नहीं होती अब, बस उसकी खटास बची होती है— जैसे जीवन धीरे-धीरे अपने ही स्वाद से कटता जा रहा हो। तुम कहते हो— मराठवाड़ा में इस बार बारिश आई थी थोड़ी-सी… पर उस “थोड़ी-सी” में ही पूरा एक अधूरा सावन छिपा होता है। यहाँ धरती खेत नहीं रही, एक फटी हुई हथेली है— जिसमें बीज नहीं, बस इंतज़ार बोया जाता है हर साल। कपास के फूल अब सफ़ेद नहीं लगते, वे किसी अधूरी चिट्ठी जैसे हैं— जिसे किसान हर मौसम में लिखता है और हर बार बिना जवाब के जला देता है। तुम जब ज्वार की बात करते हो, तो लगता है— हर दाने में एक सूखी नदी की दरार है। और उन दरारों के किनारे बैठे हैं लोग— जिन्होंने पानी से ज़्यादा कर्ज़ का स्वाद चखा है। फिर भी— पोला आता है तो बैल सजते हैं, दीवाली आती है तो मिट्टी के घरों में दीये जलते हैं। जैसे जीवन हार मानना नहीं जानता, चाहे भीतर कितना भी सूखा क्यों न हो। पर उसी रोशनी के पीछे एक लंबी अँधेरी रात है— जहाँ कई नाम सुबह तक ख़ामोश हो जाते हैं। तुम कहते नहीं— पर मैं जानती हूँ कि अब रस्सी और कीटनाशक सिर्फ चीज़ें नहीं रहीं, वे धीरे-धीरे निर्णय बनती जा रही हैं। और फिर घोषित कर दी जाती है “सामान्यता”— जैसे सब कुछ ठीक है, जैसे मरना भी अब इस मिट्टी की आदत हो। तुम लौटते हो— खाली हाथ, थकी हुई देह, और आँखों में उबलता हुआ पानी जो बरस नहीं पाता। तुम रोते नहीं— क्योंकि यहाँ आँसू भी संभालकर रखने पड़ते हैं अगले सूखे के लिए। मैं तुम्हें रोकती नहीं— बस इतना कहती हूँ— उस सूखी धरती से कहना, मैंने तुम्हें निहत्था भेजा है। क्योंकि यहाँ हथियार सिर्फ बंदूक नहीं होते— कभी-कभी सूखा, कर्ज़ और चुप्पी— मिलकर मनुष्य को सबसे ख़तरनाक हथियार बना देते हैं।
।। …समय के उस पार, जहाँ हम बचे रह जाते हैं… ।। हम अब भी मिलते हैं— चाय के उन्हीं कपों के बीच, जहाँ बातचीत नहीं, आदतें बैठती हैं आमने-सामने। तुम्हारे भीतर अब भी एक ऋतु बची है— हर साल किसी नए नाम से लौट आती है, जैसे मिट्टी अपनी जली हुई स्मृतियों के बावजूद बीज स्वीकार करना नहीं भूलती। और मैं— मैं उस मिट्टी का हिस्सा नहीं रहा, मैं वह राख हूँ जिसे हवा भी छूने से पहले हिचकती है। मेरे भीतर उगने से पहले ही हर संभावना स्मृति बनकर जल उठती है। तुम्हें वही जगहें प्रिय हैं— वही मेज़, वही पगडंडियाँ, वही ठहरे हुए दृश्य— जहाँ तुम हर बार बदलते हो, पर दुनिया तुम्हें पहचानती रहती है। और मैं… मैं हर दृश्य से थोड़ा-थोड़ा बाहर गिरता गया, इतना कि अब कोई भी जगह मुझे पूरा स्वीकार नहीं करती। हम फिर भी चलते हैं साथ— घास के बीच, उन पहाड़ियों की ओर जहाँ हवा पुराने शब्दों को भी नई आवाज़ दे देती है। तुम्हारा शरीर अब भी पीड़ा से भरा है— पर वह पीड़ा तुम्हें तोड़ती नहीं, बस तुम्हारे भीतर और गहरा फैल जाती है। और मैं धीरे-धीरे यह समझने लगा हूँ— कि जीवन सिर्फ जीने का नाम नहीं, बल्कि बार-बार मरकर लौट आने की एक आदत भी है। कुछ लोग हर बार जी उठते हैं— सिर्फ फिर से मरने के लिए… और कुछ— एक ही बार मरकर समय के उस पार लंबे समय तक चलते रहते हैं… जैसे अपनी ही अनुपस्थिति को जीते हुए।
।। बचना ।। ______________________________________________ अब मेरे भीतर कुछ भी हरा नहीं बचा, तुम गए तो जैसे सारी नदियाँ रास्ता भूल गईं… ______________________________________________
|| यह सुंदर नहीं है — भीतर का तट || ______________________________________________ ट्रेन अब भी चल रही थी— पर उस क्षण कुछ मेरे भीतर उतर गया था, जैसे कोई शब्द अपना अर्थ बदल देता है अचानक। मेरे बगल में बैठा वह बच्चा अब सिर्फ बच्चा नहीं था— वह एक दर्पण था, जिसमें मैं पहली बार अपनी आँखों की थकान देख रहा था। समुद्र बाहर फैला हुआ था— अनंत, विशाल, पर उसके “यह सुंदर नहीं है” के बाद वह सिकुड़ गया एक सवाल में। कितनी बार मैंने चीज़ों को सुंदर कहा है— बिना देखे, बिना महसूस किए, सिर्फ इसलिए क्योंकि शब्द तैयार थे और मैं खाली। वह बच्चा अब खामोश था, पर उसकी खामोशी मेरे भीतर बोल रही थी— जैसे कोई पुराना दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा हो। मैंने खिड़की से बाहर देखा— पर इस बार समुद्र नहीं दिखा, दिखा अपना ही प्रतिबिंब जो हर लहर के साथ टूट रहा था। सुंदरता शायद हमेशा से वहाँ नहीं थी— वह तो हमारी सहमति में थी, हमारे डर में, हमारे उस आग्रह में कि सब कुछ ठीक है। और सच— सच शायद उतना विशाल नहीं होता जितना समुद्र, पर वह गहरा होता है इतना कि एक छह साल का बच्चा उसे बिना डरे कह देता है। ट्रेन आगे बढ़ गई, तट पीछे छूट गया, पर वह वाक्य अब भी मेरे साथ है— जैसे कोई छाया जो रोशनी से नहीं, अंदर के अंधेरे से बनती है। और अब जब भी मैं कुछ देखता हूँ— मैं ठहर जाता हूँ, थोड़ा डरता हूँ, और सोचता हूँ— क्या यह सच में सुंदर है, या मैं फिर से झूठ को नाम दे रहा हूँ। ______________________________________________ anup ashok gajare
।। कोई आईना था? ।। ______________________________ मैंने कई बार खुद को पुकारा— नाम लेकर नहीं, बस उस खालीपन से जहाँ आवाज़ गिरकर लौटती नहीं। चेहरा मेरे पास था शायद, पर पहचान— वह कहीं रास्ते में छूट गई, जैसे भीड़ में अपनी ही उँगली छोड़ देता है कोई बच्चा। चाँद आज फिर अलग-अलग जगहों पर टूटा पड़ा है— कहीं बैंगनी सड़न की तरह, कहीं पीला, जैसे पुराने कागज़ पर पड़ी धूप, और कहीं— एक हरा, जो आँखों में नहीं सिर्फ डर में उगता है। पर जो सफेद है— वह कहीं नहीं दिखता। शायद सच्चाई हमेशा दूर के छोटे कस्बों में मरती है, जहाँ कब्रें नाम नहीं रखतीं। मैं समय के अंदर चला गया था— घड़ियाँ वहाँ पेड़ थीं, और हर सेकंड एक पत्ता बनकर मेरे कंधों पर गिर रहा था। मैंने एक घंटा सुना— वह प्रेम नहीं था, वह ठंड थी, इतनी गहरी कि धड़कन भी अपने अर्थ भूल जाए। हवा आज कुछ लेकर नहीं आई— वह गर्भवती थी पर जन्म नहीं हुआ, बस छायाएँ थीं जो आधी बनीं और वहीं सड़ गईं। एक चिड़िया गा रही थी— या शायद वह सिर्फ मेरे अंदर की गूँज थी, जो बाहर आकर अपने ही अस्तित्व पर शक कर रही थी। मैंने आईने ढूँढे— पर जो मिला वह सिर्फ प्रतिबिंब का भ्रम था। मेरी अंगूठी— वह कभी थी ही नहीं, फिर भी उसका खोना इतना सच्चा क्यों लगा? क्या हम सिर्फ उन्हीं चीज़ों के लिए रोते हैं जो नहीं होतीं? क्योंकि जो होती हैं— वे सह ली जाती हैं। तुम— शायद मिली थी, या मैं ही तुम्हें गढ़ता रहा अपने भीतर के खाली हिस्सों से। तुम्हारे बाल किसी समय-नदी की तरह थे, और मैं हर लहर में अपनी ही डूबन देखता रहा। हम पास थे— इतने कि साँसें टकराती थीं, पर पहचान— वह दोनों के बीच मर चुकी थी। मेरे भीतर कुछ रेंगता है— वह दर्द नहीं, वह याद भी नहीं, वह कुछ ऐसा है जो हर पुराने स्पर्श पर जाग जाता है। और तुम कहती हो— "हम अभी पैदा नहीं हुए।" तो यह सब— यह स्पंदन, यह टूटना, यह खोज— किसकी है? मैं हर शाम खुद को खत्म करता हूँ, और हर सुबह कोई और मेरे भीतर जागता है। लोग मेरे सीने से गुजरते हैं— जैसे मैं कोई रास्ता हूँ, कोई ठहराव नहीं। सब कुछ फैल गया है— दिशाएँ, अर्थ, स्मृतियाँ— सब एक चौराहे में घुल गए हैं। और अंत में कुछ भी नहीं बचा सिवाय इस एहसास के— कि आईना न मिलना एक हादसा नहीं था। वह एक संकेत था— कि जो मैं ढूँढ रहा था, वह देखने की चीज़ नहीं थी। वह शायद कभी था ही नहीं। ____________________________________________________ Anup Ashok Gajare
|| बचा हुआ — विस्तार || ____________________________________________________ हम गहरे नीले रंग के उस कमरे में रहते हैं जहाँ दीवारें सिर्फ दीवारें नहीं, अंतर की नमी से भीगी हुई स्मृतियाँ हैं— और छत पर टंगा सन्नाटा धीरे-धीरे श्वास लेता है। पुंज-पुंज आलोक सरस्वती की ध्वनि की तरह नहीं, बल्कि उस अधूरे उच्चार की तरह है जो जन्म लेने से पहले ही मन की शिराओं में बहने लगता है— एक ऐसा संगीत जिसे कोई सुनता नहीं, फिर भी सब उसी में डूबे हैं। बाहरी दुनिया और भीतरी दुनिया के बीच अब कोई रेखा नहीं बची— रेखाएँ थीं भी तो हमने उन्हें छू-छूकर मिटा दिया, या शायद वे खुद ही हमारी उपस्थिति से लुप्त हो गईं। सब अपने हैं— पर यह अपनापन भीड़ का नहीं, एक गहरे अकेलेपन का विस्तार है, जहाँ हर चेहरा हमारी ही छाया का दूसरा रूप बन जाता है। रोग, शोक, मृत्यु— क्या वे सच में हमें छूते नहीं? या हमने ही अपने स्पर्श को इतना भीतर खींच लिया है कि बाहरी आघात अब सतह तक पहुँच ही नहीं पाते? गुलाब की पंखुड़ियाँ अब रंग नहीं छोड़तीं, रजनीगंधा की खुशबू सिर्फ एक स्मृति बनकर रह गई है— जैसे किसी पुराने जन्म की भूली हुई भाषा। दर्द और खुशी— ये दो नहीं, एक ही वृत्त के अलग-अलग बिंदु हैं जो निरंतर घूमते हुए हमारे भीतर एक ही केंद्र की ओर लौटते रहते हैं। हमारा मर्म— कोई स्थिर सत्य नहीं, बल्कि एक शिल्प है जिसे हम हर क्षण थोड़ा-थोड़ा काटते, घिसते, तराशते हैं— और अंत में वही हमें गढ़ देता है। हमने यह तय किया था— बिना किसी संवाद के, बिना किसी साक्षी के— कि जीवन को ऐसे ही बहने देंगे, जैसे एक नदी अपना मार्ग खुद ही भूल जाए और फिर भी समुद्र तक पहुँच जाए। किसी से पूछा नहीं— क्योंकि प्रश्नों में हमेशा एक बाहरी दृष्टि होती है, और हमने अपने भीतर की दृष्टि को ही एकमात्र सत्य मान लिया। यह सब लेकर बीत जाएगा हमारा जीवन— धीरे-धीरे, बिना किसी उद्घोष के, जैसे समय अपने ही पदचिन्हों को मिटाता हुआ चलता है। गहरा नीला रंग— अब एक रंग नहीं, एक अवस्था है, जहाँ प्रकाश भी अंधकार के भीतर जन्म लेता है। और सरस्वती का वह संगीत— अब शब्दों में नहीं, बल्कि उस मौन में बसता है जहाँ कुछ भी कहा नहीं जाता, पर सब कुछ सदैव कहा जा चुका होता है। ____________________________________________________ Anup Ashok Gajare
"तमस" --- गूंगा होना कोई विकल्प नहीं, अंधा या बहरा होना भी नहीं। लेकिन जब गाड़ी फँस जाती है कर्ण की तरह किसी सड़क के गड्ढे में, तब फोटो क्यों नहीं लिया जाता? बस चलान काटने के लिए ही ये सिस्टम है क्या? उस शापित वक्त में नागरिक ही नहीं, बल्कि सत्ता भी अंधी, गूंगी या बहरी हो जाती है। पता है कि रात में फूटे स्ट्रीट लाइट प्रकाश का दान देने में असमर्थ हैं, फिर भी इंद्र ऐरावत पर घूमते हैं। उन्हें चाहिए, किसी भी हाल में दान या मतदान। टेबल के नीचे हरी घास उगती है— अब वह नीली हो गई है जैसे रक्त ने अपना रंग बदलने से इंकार कर दिया हो। नीलापन सिर्फ आसमान का नहीं होता, वह घावों में भी उतरता है— धीरे-धीरे, बिना आवाज़ के। और हम— जो गूंगे नहीं हैं, फिर भी बोलते नहीं, अंधे नहीं हैं, फिर भी देखते नहीं, बहरे नहीं हैं, फिर भी सुनते नहीं— हम किस श्रेणी में आते हैं? शायद हम वही हैं जो हर दिन अपने भीतर की अदालत में खुद को बरी कर देते हैं। सड़क के गड्ढे सिर्फ डामर नहीं तोड़ते, वे समय को भी चीरते हैं— जहाँ हर गिरती हुई गाड़ी के साथ एक भरोसा मरता है। और उस क्षण कोई कैमरा नहीं खुलता, कोई सबूत नहीं बनता— बस एक और कहानी अधूरी रह जाती है किसी फ़ाइल के कोने में। इंद्र के रथ के पहिए कीचड़ में नहीं धँसते, क्योंकि उनके रास्ते पहले से साफ़ कर दिए जाते हैं— हमारे हिस्से की धूल से। दान और मतदान के बीच जो अदृश्य पुल है, वहीं सबसे अधिक लेन-देन होता है— जहाँ उँगलियों पर लगी स्याही धीरे-धीरे नसों में घुल जाती है। और तब लोकतंत्र एक शब्द नहीं रहता, वह एक थकी हुई देह बन जाता है जिसे हर पाँच साल में जगा कर फिर से सुला दिया जाता है। मैं पूछता हूँ— क्या सच में गूंगा होना विकल्प नहीं है? या यह सबसे सुरक्षित विकल्प है इस समय में? जहाँ सवाल पूछना सबसे बड़ा अपराध है, और चुप रहना सबसे बड़ी कमजोरी। --- Anup Ashok Gajare
"सपने" --- फर्श पर बिखरी ठंडक रात आंखे भींच गई। नीली बूंद टपक रही हैं किसी ने नल खुला छोड़ा उठ नहीं सकता दिन का बोझ ढोती नदी उतर रही है समुद्र में। ये कौन प्रदेश कैसी भूमि पर नंगे पैर चल रहा भारहीन शरीर। सलून की दुकान आईने लगे हुए उसमें प्रतिमा नहीं क्या मैं खो गया हु। ये झाग सेविंग क्रीम गालों पर रगड़ता हुआ आदमी, किसके गाल है ये इतने विशाल मुख के भीतर कितनी सीढ़ियां लगी है श्रुति, वेद, प्रकाश, अंधकार भी हर पायदान से होता हुआ नीचे ऊपर कर रहा है, कितने मृत कितने जीवित प्राणी समा रहे उस मुख के अंदर। उसकी दाढ़ी खत्म वह काम पर निकला है उसकी टिफिन में चांद या सूरज घूम रहे हैं। क्या ये सपना है नहीं शायद हां, वाकई ये दुर्लभ सपना है। मैं पूरी तरह से जानता हूं कि, मेरी ही निद्रा में मैं जाग रहा हु। भूमि बदल गई कोई प्यास से बुझ रहा भूख से बिलग रहा जीव भी शायद अमीबा है इसकी मृत्यु नहीं इसका विभाजन होता मैं देख रहा हु। फिर जमीन बदल गई यहां कोई केंद्र नहीं मैं जहां खड़ा हु शायद वही केंद्र है या मैं जहां नीद से भरा पड़ा हु वह भी केंद्र हो सकता है विस्फोट हर जगह हो रहे है हर धमाके में एक नया केंद्र उभर रहा है। भूमि फिर खिसक गई या शायद मैं ही अपने ही भीतर सरक गया। एक आवाज थी बहुत दूर से आती हुई जैसे कोई नाम पुकार रहा हो पर वह मेरा नाम नहीं था। कानों के भीतर कुछ दरवाज़े खुले और बंद हो गए बिना हवा के। मैंने हाथ बढ़ाया तो उंगलियों से रेत नहीं समय झरने लगा। घड़ी कहीं नहीं थी पर टिक-टिक हड्डियों में हो रही थी। एक बच्चा दिखा मेरे सामने वह रो नहीं रहा था बस देख रहा था मुझे जैसे वह जानता हो मैं अभी टूटने वाला हूँ। उसने मुट्ठी खोली उसमें एक छोटा सा अधूरा ग्रह था जिस पर आधी रोशनी आधा अंधेरा अटका हुआ था। मैंने उसे छूना चाहा तो वह बच्चा अचानक वृद्ध हो गया और उसकी आँखों में हजारों जन्मों की थकान इकट्ठी थी। वह बोला नहीं पर उसके होंठ हिले— “तुम हर बार यहीं आते हो।” मैं पीछे मुड़ा तो वही सलून पर अब आईनों में चेहरे थे— सभी मेरे पर कोई भी मैं नहीं। एक चेहरा हँस रहा था एक रो रहा था एक बस खाली था और एक धीरे-धीरे मिट रहा था। मैंने एक को पकड़ना चाहा तो पूरा आईना पानी बन गया और मैं उसमें डूबने लगा। नीचे कोई तल नहीं था सिर्फ गिरना था और गिरते हुए मैंने देखा— अमीबा अब ग्रह बन चुके थे और ग्रह फिर से कोशिकाओं में बंट रहे थे। जीवन और मृत्यु एक ही धड़कन के दो किनारे नहीं थे बल्कि एक ही वृत्त के घूमते हुए बिंदु थे। फिर अचानक सब कुछ रुक गया। ना आवाज ना गति ना विचार। सिर्फ एक बिंदु— इतना सूक्ष्म कि उसमें पूरा विस्तार समा जाए। मैंने सोचा यही केंद्र है। पर जैसे ही सोचा वह बिंदु फट गया। और उसके भीतर से अनगिनत “मैं” बाहर गिरने लगे— हर एक अलग हर एक अधूरा। मैंने उनमें से एक को पहचानने की कोशिश की पर तभी— आंखें खुल गई। फर्श अभी भी ठंडा था नल अब भी टपक रहा था और रात अब भी अधूरी थी। मैं उठा नहीं बस लेटा रहा और पहली बार मुझे लगा— शायद मैं अभी भी सपने में किसी अज्ञात सपने को कंधे पर लादे चल रहा हु। -
"राम" ____________________________________________________ राम! क्या ये शब्द है या वाक्य अक्षर? नहीं। इसकी अनामिकता जटिल संरचना से भरे दो ग्राम ने कभी भी विषद ही नहीं की या यू कहो तो ये उसके लिए संभव ही नहीं है। राम ब्रह्मांड में अनंत पलों को जन्म देता है सृजन का निर्माण ही यहां से हुआ है और विनाश भी अपनी अंतिम श्वास इसके लिए ही तो खर्च करता है, था, या रहेगा। यू ही नहीं इस शब्द को किंकर ने छाती फाड़ दिखाया। निर्णय लेने की बेहद रुक्ष क्रिया ही इस शब्द को बुनती रही। चौदह साल वनवास यानी सिर्फ जंगल में रहना नहीं होता वहां के परिवेश में घुलते हुए नमक की तरह एक होना ही वनवास है बस पिता के किसी काल में दिए वचन में बंधकर अरण्य में विचरण करना कितना कठिन होता है। वर्तमान समय में क्या कोई ऐसा कर सकता है दो घंटे पिता के कहने पर अपना प्रिय मोबाईल न छोड़े कोई। फिर भी राम किसी ग्रंथ में बंद किसी मंदिर में स्थापित या किसी नारे में अटका हुआ नहीं है। वह तो उस क्षण में जन्म लेता है जब कोई अपनी इच्छा के विरुद्ध सही का चयन करता है। जब भीतर का रावण दसों दिशाओं में तर्क लेकर खड़ा होता है और फिर भी एक क्षीण-सी आवाज निर्णय लेती है— वही राम है। धर्म यहाँ शास्त्र नहीं स्थिति है, और अधर्म कोई राक्षस नहीं बल्कि वह सरल रास्ता है जिसे चुनना हम रोज़ चाहते हैं। राम कभी तीर नहीं चलाता पहले वह स्वयं को साधता है, वह जानता है कि सबसे कठिन युद्ध लड़ाई नहीं, त्याग है। आज अरण्य पेड़ों में नहीं स्क्रीन के भीतर उग आया है, जहाँ हर क्षण मृगमारीच की तरह कुछ चमकता है और हम पीछे दौड़ते रहते हैं। सीता अब कोई स्त्री नहीं बल्कि मन की वह शांति है जो हर बार भटकने पर हर ली जाती है। और लक्ष्मण रेखा? वह किसी भूमि पर खींची रेखा नहीं बल्कि वह मर्यादा है जिसे हम जानबूझकर पार करते हैं। राम अब भी वहीं खड़ा है— किसी अयोध्या में नहीं किसी वन में नहीं बल्कि उस छोटे-से निर्णय में जहाँ कोई देख नहीं रहा होता और फिर भी तुम सही चुनते हो। शायद राम कभी जन्मा ही नहीं और कभी मरा भी नहीं, वह हर उस मनुष्य में धीरे-धीरे बनता है जो अपने भीतर के शोर के बीच एक क्षण के लिए सत्य को सुन लेता है। और तब कोई युद्ध नहीं होता कोई विजय नहीं होती बस एक मौन जन्म लेता है— जिसे तुम राम कहते हो। या शायद सन्नाटे से भी आगे जो कुछ है, था, रहेगा वही राम है, था, रहेगा। _______________________________________________
"क्लिक क्लिक" ____________________________________________________ कैमरा,क्लोजप,शॉट गुनाह, मुजरिम, कैद क्लिक… गुजर गई शाम कोई तस्वीर नहीं खींची बस ऊंची दीवारों पर लगे लोहे के खंभे मुझे देखते रहे। एक कैदी मर गया आजादी से पहले वह तो कल ही रिहा होनेवाला था। किसी जमीन ने निगल लिया बेंच पर बैठी बुढ़िया को उसके सपने मृतकों से बातें करते हुए कैद हो गए ईश्वर की पेंटिंग में। बारिश बहुत मात्रा में हो सकती है कोई अंदाजा लगाता रहा आज तीसरा दिन है बादल बस गुस्सा होते हुए खींच रहे हैं रौशनी से भरी क्लिक को। यहां वातावरण ही फैला है उसका वजूद आंखों में चमकता हुआ मस्तिष्क की जटिल संरचना में किसी न्यूरॉन्स से उलझा सा हवा को बंद करना चाहता है। नन्ही गुड़िया सोई नहीं उसके शुष्क चित्र नहीं रहते अब किसी बच्चे की आंख में। तिनका उड़ता हुआ समय में फंस गया है उसके भीतर भी निर्माण का कोई तिनका निवारण खोज रहा है। मैं सबको किसी अज्ञात पेटी में ताला बंद करते हुए चाबी फेक देता हु। अब कैमरा क्लोजप नहीं लेता न ही कोई दृश्य, स्थान या व्यक्ति के भीतर भ्रूण की तरह पांव मारता है। कैदी दुर्गंध से परेशान है उनकी जेल में कही लकड़हारे फाइलों को जला रहे हैं, जैसे कारागृह नहीं मनकर्णिका घाट हो जिसकी हर शाम बुझते हुए ही निकलती है हर बंदी फोटोग्राफी में तरबेज एक फोटो ही तो है। क्लिक… क्लिक… पर कोई आवाज़ अब दर्ज नहीं होती सिर्फ कंपन बचता है हड्डियों के भीतर धीरे-धीरे फैलता हुआ। दीवारें अब सीधी नहीं रहीं वे झुककर मेरे कान में कुछ फुसफुसाती हैं— कि हर तस्वीर अपनी ही मृत्यु का पूर्वाभ्यास होती है। लोहे के खंभे जिन्होंने मुझे देखा था अब जंग खाते हुए मेरी आंखों में उग आए हैं और मैं खुद को ही कैद करता जा रहा हूँ। एक और कैदी जिंदा है अभी पर उसकी परछाई पहले ही रिहा हो चुकी है वह बाहर घूम रही है भीड़ में किसी और के चेहरे पर। बुढ़िया की जगह अब एक गड्ढा है जिसमें पानी नहीं बल्कि समय जमा है कोई उसमें झांकता है तो अपना बचपन डूबता हुआ देखता है। ईश्वर अपनी पेंटिंग से बाहर आ चुका है उसने ब्रश फेंक दिया है और अब वह भीड़ में खड़ा किसी और चित्र का इंतजार कर रहा है। बारिश रुक गई है पर बूंदें अब भी गिर रही हैं अंदर कहीं जहां कोई आसमान नहीं होता। न्यूरॉन्स अब संकेत नहीं भेजते वे सिर्फ पुरानी तस्वीरों को बार-बार जलाते हैं और राख से नई कैद बनाते हैं। नन्ही गुड़िया अब जाग चुकी है पर उसकी आंखों में कोई सपना नहीं सिर्फ एक खाली फ्रेम है जिसमें वह खुद को ढूंढती रहती है। तिनका अब टूट चुका है और उसके कण हवा में नहीं समय के भीतर फैल गए हैं हर क्षण किसी अधूरे निर्माण की खुजली लिए। मैं जिस पेटी में सबको बंद कर रहा था अचानक महसूस करता हूँ— वह पेटी बाहर नहीं मेरे सीने के भीतर है। चाबी जिसे मैंने फेंक दिया था वह वापस आकर मेरी जीभ के नीचे छुप गई है पर मैं बोल नहीं सकता। कैमरा अब मेरे हाथ में नहीं वह मेरी आंख बन चुका है और हर पलक झपकना एक स्थायी कैद है। क्लोजप… इतना करीब कि चेहरे गायब हो गए सिर्फ त्वचा बची है और उसके नीचे धीरे-धीरे सड़ता हुआ समय। मनकर्णिका अब बाहर नहीं मेरे भीतर जल रही है हर विचार एक चिता है जिसे मैं खुद ही आग देता हूँ। लकड़हारे फाइलें नहीं नाम जला रहे हैं पहचान धुएं में बदलती है और आसमान उसे वापस नहीं लेता। अब कोई कैदी नहीं कोई जेल नहीं सिर्फ फ्रेम हैं एक के भीतर एक अंतहीन। और हर फ्रेम में एक आदमी खड़ा है क्लिक होने का इंतजार करता हुआ— क्लिक… पर तस्वीर कभी पूरी नहीं होती। _____________________________________________
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