मेरी खिड़की से
मेरे नए- से घर के
नए - से कमरे की
नई - सी दीवार पर खिड़की से
रोज़ धूप का एक टुकड़ा
मुझसे मिलने चला आता था।
बिल्कुल पसंद नहीं था मुझे
उसका यूँ बेमतलब, बेवजह
मेरी खिड़की से चले आना।
खिड़की बंद की,
पर वह नहीं माना।
पर्दा गिराया,
फिर भी नहीं माना।
किसी न किसी बहाने
वह आ ही जाता था।
धीरे-धीरे
वह मेरी ज़िंदगी का
एक अनचाहा हिस्सा बन गया।
फिर मौसम बदला...
ठंड ने दस्तक दी,
तो वही अनचाहा
अपना-सा लगने लगा।
मैं कुर्सी डालकर
गुलज़ार की किताब पढ़ती,
और वह चुपचाप
मेरे साथ पढ़ने बैठ जाता।
उसकी अदा भाने लगी
सूरज से नज़रे चुरा कर आना
कभी कभी बादलों से मेरे लिए लड़ कर
वापिस खिड़की से फांद आना।
अब उसका आना
मेरे इंतज़ार में शामिल हो गया था।
और उसका
धीरे-धीरे लौट जाना
मुझे डराने लगा।
मोहब्बत-सी 💕 हो गई थी
कमरे की उस खिड़की से,
और उससे भी ज़्यादा
उस धूप के छोटे-से टुकड़े से,
जो बिना दस्तक दिए
हर रोज़ मिलने चला आता था।
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मेरी आवाज़ घुटकर रह गई
जब खिड़की हटाकर
उसकी जगह एक दीवार खड़ी कर दी गई।
मैं भागकर बाहर गई
उस टुकड़े से मिलने,
पर वहाँ
सिर्फ़ धूप थी।
पता नहीं कहाँ खो गया
मेरा वह धूप का टुकड़ा।
बहुत ढूँढ़ा,
पर वह कहीं नहीं मिला।
जहाँ कभी खिड़की हुआ करती थी,
उस दीवार से कान लगाकर
उसकी आहट सुनती हूँ।
शायद वह दस्तक दे...
शायद कुछ कहे।
मैं कभी बाहर,
कभी भीतर
उसे पुकारती फिरती हूँ—
शायद किसी दिन
वह भी मेरा नाम पुकारता मिल जाए।
आज भी
उसी कमरे में,
जहाँ कभी खिड़की थी,
मैं उसके इंतज़ार में बैठी हूँ।
शायद किसी सुबह
कोई दीवार
फिर से खिड़की बन जाए...
और धूप का मेरा वह टुकड़ा
लौट आए।
सूरज अब भी हर रोज़ उगता है,
बस मेरी खिड़की वाला
धूप का टुकड़ा नहीं आता। 😔
अगर किसी की खिड़की से
एक उदास, सफ़ेद, कमज़ोर-सा
धूप का टुकड़ा दिखाई दे...
अगर वह खामोशी से
मेरा नाम—'कल्पिता'—पुकारे,
तो मुझे बुला लेना।
क्योंकि मेरे पुराने-से घर की
पुरानी-सी दीवार पर
अब कोई खिड़की नहीं है। 💔
कल्पिता 🌻
दिल से दुनिया तक ❤️