जुगनू और सूर्य
रात में जुगनू बहुत सुंदर लगता है। अंधेरे में उसकी छोटी-सी चमक भी चमत्कार जैसी प्रतीत होती है। लेकिन क्या कभी किसी जुगनू ने रात को दिन बनाया है?
यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। जहाँ अंधकार अधिक होता है, वहाँ छोटी-सी रोशनी भी ईश्वर जैसी लगने लगती है।
आज धर्म के नाम पर यही हो रहा है। जिसने दो-चार शास्त्र पढ़ लिए, कुछ प्रभावशाली शब्द सीख लिए, कुछ अनुयायी इकट्ठे कर लिए, वह गुरु कहलाने लगा। जिसने कुछ चमत्कार दिखा दिए, वह अवतार घोषित हो गया। जिसने भीड़ जुटा ली, उसे लोग सूर्य मान बैठे।
लेकिन भीड़ सत्य का प्रमाण नहीं होती। भीड़ केवल अपनी आवश्यकता का प्रमाण होती है। प्यासा व्यक्ति मृगतृष्णा को भी पानी समझ सकता है।
सच्चा गुरु तुम्हें अपने पास बाँधता नहीं, तुम्हें स्वयं तक पहुँचाता है। उसका कार्य तुम्हारे भीतर वह दीप जलाना है, जिसके बाद तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता न रहे।
धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय का सदस्य बनना नहीं है। धर्म का अर्थ है—अपने भीतर के अंधकार को पहचानना और उसे देखना। जो अंधकार को देख लेता है, उसके भीतर प्रकाश अपने आप प्रकट होने लगता है।
समस्या यह नहीं कि संसार में झूठे गुरु हैं। झूठे गुरु हमेशा रहे हैं। समस्या यह है कि मनुष्य सत्य से अधिक सांत्वना चाहता है। सत्य कठिन है, क्योंकि वह तुम्हारा अहंकार तोड़ता है। सांत्वना आसान है, क्योंकि वह तुम्हारे भ्रमों को सहलाती है।
इसीलिए जुगनू अधिक लोकप्रिय हैं और सूर्य कम।
सूर्य को तुम्हारी प्रशंसा की आवश्यकता नहीं। वह उगता है, क्योंकि उसका स्वभाव प्रकाश देना है। उसे अनुयायियों की भी ज़रूरत नहीं, प्रमाणपत्रों की भी नहीं। उसका होना ही उसका प्रमाण है।
जो वास्तव में जाग गया है, वह तुम्हें अपने विश्वास नहीं देगा; वह तुम्हें देखने की आँख देगा। वह तुम्हें विचार नहीं देगा; वह तुम्हें जागृति देगा। वह तुम्हें अपने पीछे चलने के लिए नहीं कहेगा; वह तुम्हें स्वयं के भीतर उतरने का साहस देगा।
जब तक तुम उधार के प्रकाश से संतुष्ट रहोगे, जुगनू तुम्हें सूर्य लगते रहेंगे। जिस दिन तुम्हारे भीतर चेतना का सूर्य उदित होगा, उसी दिन समझ में आएगा कि अब तक जो चमक दिखाई देती थी, वह केवल अंधकार की पृष्ठभूमि पर खेलता हुआ एक छोटा-सा भ्रम थी।
वेदांत 2.0 Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685
(इंटरनेशनल रजिस्टर्ड – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:
वेदांत 2.0 “न मार्ग, न साधना, न नियम –
केवल समझ।
जो देख लिया, वही मोक्ष;
जो समझ गया, वही साधना, तो अभी जी लिया वही ईश्वर जीवन ही ईश्वर है।"