अब डर लगता है।
डर लगता है मेरा बुरा साया उसकी खुशियाँ ना छीन ले,
उसकी खिलखिलाती आँखें नम ना हो जाएँ।
डर लगता है कि कहीं मैं ही उसकी दुश्मन ना बन जाऊँ,
डर लगता है
उसके अंतर्मन की गहराइयों में छुपी कुंठा,
उसके जेहन में मेरे लिए दबे तिरस्कार से।
डर लगता है कि
कहीं मेरे होने का अर्थ ही उसके लिए एक संघर्ष ना बन जाए,
मेरा नाम उसकी बेचैनियों का कारण ना बन जाए।
डर लगता है ,
मेरी मौजूदगी
उसे उसके हिस्से की खुशियों से दूर ना कर दे,
और मुझे चुनने की कीमत
उसे हर रोज़ खुद से ही ना चुकानी पड़े।
डर लगता है,
एक उस ऐसे दिन से
जब मेरी आहट पर उसके चेहरे की मुस्कान बुझ जाए,
और मेरी ओर बढ़ते उसके कदम अनचाहे ही ठहर जाएँ।
डर लगता है
कही मैं उसके जिंदगी की सबसे बड़ी भूल न बन जाऊं
और अंत में
डर लगता है कि
वो मुझसे नहीं,मेरे वजूद से नफ़रत करने लगे;
मेरी परछाईं भी उसे अपने जीवन पर एक अभिशाप लगे।