यह एक भावनात्मक, सामाजिक और परिवार-केंद्रित नाटक है, जिसमें "घर-घर की कहानी" का दर्द और अंत में एक बड़ा संदेश है।
# **नाटक: "जीते जी अनदेखी, मरने के बाद देवी"**
### पात्र:
* माँ (सरस्वती)
* बड़ा बेटा
* बहू
* छोटा बेटा
* पड़ोसी
* पुजारी
---
### दृश्य 1: रसोई
(माँ सुबह से खाना बना रही है।)
**माँ:** बेटा, खाना तैयार है।
**बेटा (मोबाइल देखते हुए):** रोज़-रोज़ वही खाना! कुछ अच्छा नहीं बनता?
**बहू:** मम्मी जी, आपसे अब काम भी ठीक से नहीं होता। रहने दीजिए।
माँ चुपचाप आँसू पोंछकर रसोई में चली जाती है।
---
### दृश्य 2: बीमारी
माँ को तेज़ बुखार है।
**माँ:** बेटा... डॉक्टर के पास ले चलो।
**बेटा:** अभी ऑफिस जाना है।
**बहू:** दवाई रखी है, खा लीजिए।
माँ अकेली चारपाई पर लेटी रहती है।
---
### दृश्य 3: मृत्यु
एक सुबह पड़ोसी दौड़ते हुए आते हैं।
**पड़ोसी:** अरे... सरस्वती दीदी नहीं रहीं...
पूरा घर रोने लगता है।
---
### दृश्य 4: तेरहवीं
बड़ा फोटो, फूलों की माला, पंडित मंत्र पढ़ रहे हैं।
**पुजारी:** माता समान कोई नहीं। इनके नाम पर दान कीजिए।
बेटा फूट-फूटकर रोता है।
**बेटा:** माँ... एक बार वापस आ जाओ। मैं आपकी बहुत सेवा करूँगा।
---
### अंतिम दृश्य (संदेश)
स्टेज पर धीमी रोशनी।
**आवाज़ (Narrator):**
> **"यही हर घर की कहानी है।**
> **जीते जी माँ की बात कोई नहीं सुनता,**
> **और मरने के बाद उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाता है।**
> **माँ को भगवान मत बनाइए...**
> **उन्हें जीते जी सम्मान और प्यार दीजिए।"**
**समाप्त।**