“रिश्ता “
कभी अगर कोई पूछ बैठे,
तुम्हारा रिश्ता क्या था उससे?
मैं पहले थोड़ी देर चुप रहूँगी।
जैसे कुछ रिश्तों का नाम लेने से पहले उन्हें एक बार फिर से जी लेना पड़ता है।
फिर मुस्कुराकर कहूँगी…
वो मुसाफ़िर था।
और मैं… उसके सफ़र का सबसे कठिन रास्ता।
वो आया था यह कहकर कि उसे मंज़िल नहीं, साथ चाहिए।
मैंने भी अपने हर काँटे से कहा, ज़रा धीरे चुभना।
मेरे हिस्से कोई अपना आया है।
मैंने अपने गड्ढों को बारिश से भर जाने दिया,
ताकि उसके कदम कम थकें।
मैंने अपनी धूल से कहा, आज उड़ना मत,
उसकी आँखों में चुभ जाओगी।
मैंने अपने तूफ़ानों से कहा, आज ठहर जाओ,
मेरा मुसाफ़िर डर जाएगा।
मगर… रास्ते अपने मौसम कब तक रोकते?
एक दिन हवा चली।
एक दिन बारिश हुई।
एक दिन बस एक काँटा उसके पाँव में उतर गया।
और उसने मुझे नहीं, अपनी दिशा बदल ली।
उस दिन समझ आया,
कुछ लोग रास्ते नहीं चुनते, आसानियाँ चुनते हैं।
आज भी लोग मुझसे पूछते हैं, क्या वह तुम्हें छोड़ गया?
मैं कहती हूँ… नहीं।
वह बस वहाँ चला गया, जहाँ रास्तों को अपनी सच्चाई साबित नहीं करनी पड़ती।
और मैं…
मैं आज भी वहीं खड़ी हूँ।
उसी धूल में, उसी आकाश के नीचे, उसी इंतज़ार के बिना।
अब अगर कोई पूछे, तुम्हारा रिश्ता क्या था उससे?
मैं मुस्कुराकर बस इतना कहूँगी…
वो मुसाफ़िर था।
और मैं… उसके सफ़र का सबसे कठिन रास्ता।
जिसे पार करने का वादा उसने किया था, मगर निभा न सका।
प्राची गुर्जर…..