"अनुभव"
अनुभव क्या होता है?
पता नहीं।
बस इतना जानती हूँ
कि एक दिन के बाद
दूसरा दिन पहले जैसा नहीं लगता।
चाँद से पूछो तो कहेगा
"तारे रोज़ टूटते हैं
मैं आदतन देखता रहता हूँ।"
पर कभी कुछ कहता नही।
सूरज कहेगा
"जलता हूँ
ताकि किसी को अंधेरा न लगे।
शाम को थक कर डूब जाता हूँ।
लेकिन मुझे कोई पूछता भी नहीं।"
संगीत वाले से पूछो
वो सुरों के बीच की खाली जगह दिखाएगा
और कहेगा
"यही सबसे ज़रूरी है।"
रंग कहेंगे
"हम काले में भी हैं।
बस तुम देखना नहीं चाहते।"
अनुभव कोई किताब नहीं
जो पढ़ ली और समझ आ गई।
अनुभव वो रात है
जब तुम जागते रहो
और सुबह पता चले
कि तुम बदल गए हो।
अनुभव ये नहीं कि तुम गिरे और उठ गए
अनुभव ये है कि गिरकर
तुमने धूल झाड़ी
और फिर से चल दिए
बिना ये सोचे
कि कोई देख रहा है या नहीं।
अनुभव के बाद आदमी
ना समझदार होता है
ना बेवकूफ।
बस थोड़ा खाली हो जाता है।
और उसी खालीपन में
पहली बार उसे
अपनी आवाज़ सुनाई देती है।
प्राची गुर्जर…..