“पेड़ “
मुझे हमेशा से पेड़ अच्छे लगे हैं।
फूलों की तरह उन्हें किसी की नज़र में रहने की जल्दी नहीं होती।
वे बस… खड़े रहते हैं।
धूप अपने हिस्से की सहते हैं,
और छाँव दूसरों के हिस्से में लिख देते हैं।
मैंने कभी किसी पेड़ को अपने फल खाते नहीं देखा।
वह सारी उम्र भरता किसी और के लिए है।
शायद प्रेम भी कुछ ऐसा ही होता होगा।
जिसमें अपना होना कम, किसी और का बच जाना ज़्यादा ज़रूरी हो।
बचपन में मैं पेड़ों से बातें किया करती थी।
उनकी छाल पर अपनी उँगलियाँ फिराकर पूछती, “दर्द होता है?”
वे कभी जवाब नहीं देते थे।
अब समझती हूँ… जो सच में मज़बूत होते हैं, वे अपने घावों की आवाज़ नहीं करते।
कई लोग पेड़ों को लकड़ी समझते हैं।
मैंने हमेशा उन्हें बुज़ुर्गों की तरह देखा।
जो कम बोलते हैं, मगर पूरी उम्र सबका बोझ उठाते हैं।
एक दिन मैंने देखा,
आँधी में सबसे पहले पेड़ की टहनियाँ टूटी थीं।
तब पहली बार समझ आया,
जो सबसे ज़्यादा दूसरों को संभालता है,
उसे ही सबसे पहले हवाओं से लड़ना पड़ता है।
अगर कभी मैं अगला जन्म माँगूँ,
तो फूल नहीं बनना चाहूँगी।
नदी भी नहीं।
मैं… एक पेड़ बनना चाहूँगी।
ताकि जिसे दुनिया थका हुआ कहकर गुज़र जाए,
वह कुछ पल मेरी छाँव में बैठकर अपने आँसू रख सके।
क्योंकि जीवन की सबसे सुंदर उपलब्धि ऊँचा होना नहीं,
किसी के लिए ठहरने की जगह बन जाना है।
प्राची गुर्जर…..