मसकारा
इतवार बुझा-बुझा बीतता,
सोमवार नुकीला, धारदार।
आस्तीन चढ़ाए, श्वेत बरकरार,
थिरकती उंगलियां दिन बिताए।
भारी पत्थर उठाए, सजाए,
चेहरे पर तना एकल भाव जताए।
डटी हिम्मत सोखती, त्रुटि भुलाए,
जब टूटा मन खुले, अश्रु झर जाए।
मसकारा रिसता, उतरता सुख जाए,
एकल भाव शाखाओं सा फूट जाए।
स्नेह में बंधी कमजोर डोरी जुड़ जाए,
जब वह खुद पिघलकर दूजे में समाए।
चंद मोती लड़ियां बिखर जाए,
पूरा दफ्तर कमरे में समा जाए।
निशा थकान गलाए, पत्ता हरा होए,
पौ फटते ही सर्वत्र अतीत दोहराए।
इतवार बुझा-बुझा बीतता,
सोमवार नुकीला, धारदार।
©DSR