बंजर ज़मीन और समुद्र
बंजर ज़मीन को
चाहत है पानी की,
तो क्या हो
अगर समुद्र
अपना थोड़ा-सा हिस्सा
उसके नाम कर दे?
बस एक मुट्ठी जल…
इतना-सा
कि सूखी मिट्टी
पहली बार
अपनी देह में
किसी संभावना को महसूस करे।
मैं सोचती हूँ
शायद उम्मीद भी
ऐसे ही जन्म लेती है।
पहले
एक बूँद उतरती है
बिना किसी वचन के।
फिर मिट्टी
उस बूँद को
अपनी स्मृति बना लेती है।
वहीं से
एक कल्पना जन्म लेती है
कि शायद
यह भूमि भी हरी हो सकती है,
शायद यहाँ भी
किसी बीज को
घर मिल सकता है।
कल्पना धीरे-धीरे
एक स्वप्न बनती है।
और स्वप्न…
कितना विचित्र है न
जितना सुंदर होता है,
उतना ही भय देता है।
डर लगता है
कि कहीं वर्षा रुक गई तो?
कहीं बीज
अंकुरित होने से पहले मर गया तो?
कहीं समुद्र ने
अपना जल वापस माँग लिया तो?
मगर फिर…
एक नन्ही-सी हरियाली
मिट्टी का सीना चीरकर
बाहर आती है।
और उस क्षण
भय पीछे छूट जाता है।
स्वप्न
यथार्थ का पहला अक्षर लिखता है।
जो कल तक
केवल सोचा था,
वह आज
आँखों के सामने होता है।
एक अंकुर
फिर पौधा बनता है,
पौधा वृक्ष बनने का
साहस करता है।
और तब समझ आता है
उम्मीद
कमज़ोरों का सहारा नहीं,
वह तो
टूटी हुई धरती के भीतर
छिपी हुई शक्ति है।
एक बूँद से
हरियाली तक पहुँचना
चमत्कार नहीं होता
यह उस मिट्टी की
निरंतर साधना होती है
जो सूखकर भी
जीना नहीं भूलती।
और फिर…
जिस भूमि को कभी
समुद्र की एक बूँद की
चाहत थी,
वहीं से
एक दिन
नदी जन्म लेती है।
वह बहती है…
अपनी प्यास पीछे छोड़कर।
और शायद यही
जीवन का सबसे सुंदर रहस्य है
जिसे कभी
एक बूँद की आवश्यकता थी,
वही एक दिन
किसी और की प्यास बुझाने लगता है।
यही है
उम्मीद का चक्र
एक बूँद से
एक कल्पना,
कल्पना से
एक स्वप्न,
स्वप्न से
एक भय,
भय से
एक साहस,
साहस से
एक यथार्थ,
और यथार्थ से…
एक नया जन्म।
प्राची गुर्जर…..