मैं जीती हुं हमेशा कल्पनाओं की दुनिया में
जब भी मैं वहां से बाहर आता हूं
तो चीखना चाहती हूं
चिल्लाना चाहती हूं जोर-जोर चीख चिख कर रो ना चाहती हूं यह का करके आखिर जिंदगी इतना बुरी क्यों है
कल्पना में होती हुं तो शगुन होता है
हकीकत से दूर जीने की वजह होती है
और जब कल्पनाओं से बाहर आ जाती हूं तो
घुटन महसूस होती है
एक पल भी घंटे के बराबर लगते हैं
जैसे समय बीती नहीं रहा समय यहीं अटक सा गया
और अटकी हुई समय में
मैं बस सांसे ले रही हूं
घुट रही हूं अंदर ही अंदर मैं मर रही
और मैं चाहती हूं कि सब खत्म हो जाए
मैं कल्पनाओं को देखकर लिख सकती हूं कि
किसी से मिला तो जिंदगी इतनी बुरी नहीं लगती
और हकीकत यह है कि
जिंदगी में कोई ऐसा नहीं जिसे देखकर लगें की
जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं
मैं क्या कर रही हुं मुझे भी नहीं पता
बस लगता है वक्त कट रही हूं
जिंदगी में कोई रुचि नहीं
मर भी जाऊं यह भी इच्छा नहीं
बस इस समय बेवजह की हेल्पलेस इंसान की तरह
कहानी अच्छी है
और हर वक्त कहानियों में भी रहकर थक गया
सच कहूं तो मैं हकीकत में जीना चाहती हूं
पर इस दुनिया में लगता है
मेरे लिए जीने के लिए कुछ भी नहीं है
मैं अभी बस रोना चाहती हूं
चेक चेक कर चिल्ला चिल्ला कर
और अपने बेबसी पर
अपनी बेकार गुजर रही लाइफ पर
सच कहूं तो मैं अपनी जिंदगी को अलविदा कहना चाहती
और चाहती हूं
अगर कोई दूसरी लाइफ हो तो इतनी बेकार ना