इश्क़ मेरी आदत नहीं, इबादत है
इश्क़ मेरी आदत नहीं, इबादत है
जहाँ माँग नहीं होती,
बस मन का समर्पण होता है।
जहाँ पाने की कोई जल्दी नहीं,
खोने का कोई भय नहीं,
जहाँ प्रेम अपने होने का
कोई प्रमाण नहीं माँगता।
दो दिल मिलें तो प्रेम कहें,
दो रूहें मिलें तो प्रार्थना हो जाए,
एक मौन दूसरे मौन को समझ ले,
तो जैसे कोई अधूरी साधना पूरी हो जाए।
यह प्रेम देह से आगे की कोई बात है,
जहाँ स्पर्श भी भीतर उतरता है,
जहाँ आँखें बंद हों
तो भी एक उपस्थिति महसूस होती है।
न कोई वचन चाहिए,
न कोई अधिकार,
न साथ रहने की शर्त,
न लौट आने की प्रतीक्षा।
बस प्रेम रहे
निर्मल, निस्वार्थ, अनंत,
जैसे नदी को समुद्र से
मिलने के लिए अपना नाम छोड़ना पड़ता है।
शायद प्रेम वही है
जहाँ दो अपनेपन में खोकर
एक हो जाने की चाह भी नहीं रखते,
बस एक-दूसरे में
अपने होने का अर्थ पा लेते हैं।
और तब प्रेमी
प्रेमी नहीं रह जाते,
वे उस मौन के दो किनारे बन जाते हैं
जिसके बीच बहती है
एक ऐसी धारा
जिसका कोई नाम नहीं।
इश्क़ मेरी आदत नहीं, इबादत है
क्योंकि इसमें किसी को पाना नहीं,
बस प्रेम में
अपने आपको खो देना है।
प्राची गुर्जर …..