मैं स्वयं को गढ़ती रही …
शिलाओं में जकड़कर भी मैं स्वयं को तराशते हुए,
हर आघात सहकर भी अपने अस्तित्व को नया रूप देती रही।
एक हाथ में प्रचण्ड संकल्प लेकर नूतन सृजन मैं करते हुए,
अपने स्वाभिमानी व्यक्तित्व से संघर्षों को परास्त मैं करती रही ।
मेरे उड़ते केश और लहराता आँचल, मुक्त चेतना का उद्घोष करते हुए,
हर परिस्थितियों के सम्मुख मैं अटल अडिग डटी रही ।
अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से आत्मविश्वास की डोर थामे हुए,
अपने संकल्प की छेनी से स्वयं को मैं निरंतर गढ़ती रही।
अब अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त हुए,
इस तरह मैं नारी अपने के लिए स्वयं को गढ़ती रही ।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’