The Inner Suffering of women...
मुख़्तसर सी बात थी...
मैने असमान के जानिब देखा
क्या ये सुनने के लिए मैने जी जान लगाया
क्या ये सुनने के लिए ज़िन्दगी दे दी?
अब तक तो किसी ख़्वाब में जी रही थी शायद
पल में मैं किसी ख़्वाब से हक़ीक़त में आ गई
जब उसने कहा - तुम्हारी हैसियत ही क्या है?
मैं तो जैसे कुछ देर उसे पहचानती रही
क्या ये वही था...?
क्या ये वही था जिसने मुझसे कभी कहा था
की तुमको मैं जी जान से ज़्यादा संवारुन्गा
और आज...
वही है जिसने कहा - मैं न रहूँ तो तुम किसी कीड़े से कम नहीं।।
क्या! कीड़े से कम नही?
और कहा
तुम किसी क़ाबिल ही नहीं,
और क़ाबिल नहीं तो मेरे घर में
तुम्हारी जगह नहीं
जाओ, निकल जाओ
के तुमको पता चले
मैं कौन हूं,
मेरी हैसियत क्या है
और तुम कौन हो
तुम्हारी हैसियत क्या है?
हैसियत क्या है?...
क्या मैने उसका घर कभी संवारा ही नहीं
या, मेरे संवारने की कभी कोई कीमत नही थी?
अब जब मेरी ज़रूरत कम हुई
तो कह दिया जाओ, चली जाओ
कि तुम कोई गुमनाम रूह हो।
तुम बेकार रूह हो।
यहां ठहर के मैंने एक लम्हे के लिए सोचा
क्या मैंने जो भी दिया वो बेमायने ही था?
तब समझी कि इस दुनिया में कोई किसी का नहीं
सब अपने मतलब के, अपने काम के हैं।।
-Azoorey