Hindi Quote in Story by ANAMCARA

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एक अधूरा सफर: खुद को पाने की चाहत में
​आखिर ऐसा भी क्या पाना था, जिसके लिए मैंने खुद को ही खो दिया?

​“अक्सर हम सफलता की दौड़ में अपनी पहचान को पीछे छोड़ आते हैं। आज की यह कहानी सिर्फ अर्णव के संघर्ष की नहीं, बल्कि उन अनकहे जज्बातों की है जो हम में से हर कोई कभी न कभी महसूस करता है। आइए ठहर कर अपने उस 'अधूरे सफर' को याद करें जिसे हम दुनिया को तो नहीं दिखा पाते, लेकिन जो हमारी रूह में कहीं दर्ज है।”

​कमरे में चल रहे पंखे की सर-सर और एसी की ठंडी हवा माहौल को ठंडा तो कर रही थी, लेकिन अर्णव के भीतर मची जलन को जैसे और हवा दे रही थी। बाहर अगस्त की स्याह रात और घुटन भरी उमस बिल्कुल उसके जीवन की दास्तान जैसी लग रही थी। अर्णव कुर्सी से उठा और चुपचाप खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।
​एक गहरी सांस लेते हुए, आंखों में बेपनाह दर्द और तकलीफ के बावजूद, उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान उभरी। उसने धीरे से गुनगुनाया, "क्या यह स्याह रात कभी खत्म होगी, या फिर जीवन का हर पन्ना अंधेरा ही रहेगा?"
​खिड़की बंद कर वह वापस अपनी जगह आ बैठा। उसकी नजर उन किताबों और नोट्स के बंडलों पर थमी, जिन पर शायद अब थोड़ी धूल जमने लगी थी। यह उसकी सालों की मेहनत और तपस्या के अकेले गवाह थे। उसने टेबल पर रखी अपनी मार्कशीट उठाई—वही मार्कशीट जो जैसे चीख-चीख कर कह रही थी कि उसने मेहनत नहीं की।
​तभी उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे। अर्णव का दिल और वह बंद कमरा, दोनों जानते थे कि उसने कितना हौसला दिखाया था। पर दुख तो यह था कि दुनिया के पास उसकी नाकामी का सबूत था, और अर्णव के पास अपनी मेहनत का कोई गवाह नहीं। आखिर जज्बातों का कोई सबूत थोड़ी होता है।
​तभी फोन की रिंग बजी। कांपते हाथों से उसने फोन उठाया। दूसरी तरफ से उसकी मां की आवाज आई, "बेटा, कैसे हो? खाना खाया?" अर्णव कुछ कहना चाहता था, पर शब्द जैसे गले में ही फंस गए। मां की आवाज में छिपे उस ममता भरे स्पर्श ने जैसे उसके सब्र का बांध तोड़ दिया। दूसरी तरफ, मां अपने बेटे की खामोशी और सुबकियों को सुनकर दिल थामे रह गई।
​उन्होंने बड़े धैर्य और प्यार से कहा, "बेटा, कोई बात नहीं। हम तुम्हारे साथ हैं। मां हर हाल में अपने बच्चों के साथ खड़ी रहती है।" सच तो यही है, इंसान चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, दुख के वक्त सबसे पहले मां ही याद आती है।
​अर्णव ने आंसू पोंछे और भारी मन से धीरे से पूछा, "मम्मी... पापा क्या कह रहे हैं?" मम्मी की आवाज में थोड़ी हंसी घुली और वह बोली, "पापा कह रहे हैं कि अर्णव को बोलो, कुछ दिन घर आ जाए... अच्छा लगेगा।"
​अर्णव ने एक भारी सांस ली और हल्के से "हां" कह कर फोन रख दिया। पर उसके मन को तसल्ली नहीं थी। वह गहरी सोच में डूब गया—कैसे एक एग्जाम की तैयारी के लिए उसने अपना घर छोड़ दिया, दोस्तों से दूरी बना ली, और आखिर में उसका वह एक प्यारा रिश्ता भी बेरोजगारी की भेंट चढ़ गया। और अब, इन सबके बीच... उसने शायद खुद को ही खो दिया था।
​तेज हवा की वजह से खिड़की फिर से खटकी, तो वह अपने खयालों से बाहर आया। उसने एक गहरी सांस ली और खुद से ही पूछा: "आखिर ऐसा क्या पाना था, जिसके लिए मैंने खुद को ही खो दिया?"
​एक एहसास
​कभी-कभी हम वक्त की भाग-दौड़ में इतने खो जाते हैं कि रुक कर यह सोचना भूल जाते हैं कि हम असलियत में क्या चाहते हैं। सफलता जरूरी है, मगर क्या अंत में खुद को ही खो देना सही है? आज शायद वक्त है खुद को फिर से ढूंढने का। इस सफर के कुछ पन्ने शायद हम सभी के पास होते हैं—वह अधूरे हिस्से जो हम किसी को दिखा नहीं पाते, पर खुद में महसूस करते हैं।
☆अनामकारा

Hindi Story by ANAMCARA : 112037214
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