असमर्थ
न मैं महलों का राजा
न मैं खानदानी रईसज़ादा ,
न मैं इश्क़ में बातूनी
बस मैं सीधा-साधा ,
इक लेखक, कवि
कलम का पक्का पूजारी ,
रचना का सच्चा जोहरी
तलाश है मुझे कहानी की,
खोज है मुझे काव्य की
इस कलयुग के पाषाण हृदय में
किन्तु असमर्थ हूंँ !
उनकी असहनीय, अकल्पनीय
राक्षसी वृत्ति जानकर ,
अब मेरी दृढ़ शब्द रचना भी
शून्य, मौन, एकांत में ,
क्षण-क्षण कंपकंपाती रहीं
कण-कण धूमिल हुई ,
तुच्छ विचारधारा...
पूर्ण क्षतिग्रस्त होकर ,
मन-मस्तिष्क से ,
पतझड़ की तरह झड़ गई
पुष्प की तरह सूख गई
ऋतुचक्र की प्रक्रिया में ,
शुद्ध रुप से पुनजीर्वित होने ।।
©®- शेखर खराड़ी,
तिथि -२६-९-२०२५