बावरी छोरी...
थारो म्हारो छोरा..,
कोणी मजो न आवें..!
थारे चौखो इश्क़ करनो हैं
म्हारे पक्के हिवडै़ सूं..
तो आणा ठाठ-बाट से ,
ऊंची ऊंटनी पर बैठ'र
कवि उदेपुर, जयपुर
आंख्यों सूं मन्ने निरखने ,
सांसों सूं म्हारो पतों पूछणे ?
म्हें..घणी बाबरी छोरी !
रात-दिन बस थारी बाट जोवूं
टेम मिले तो आता अठै !
कदि रेतीले टीले पार
म्हारे सूणे- सूणे सपणो में
थांसू मुलाकात करणे।
©®- शेखर खराड़ी
तिथि-१/१०/२०२६
- राजस्थानी की देशी भाषा का ठाठ-बाट