शाम के छः बजकर बीस मिनट।
घर में सन्नाटा।
केवल फ्रिज की हल्की-सी गुनगुनाहट और दूर कहीं पड़ोस के बच्चे का साइकिल का घंटा।
मैं किचन से निकली।
ड्रॉइंग रूम की मेज पर नज़र पड़ी।
वही आधा गिलास।
पानी का।
ठंडा।
ऊपर से बर्फ का एक छोटा-सा टुकड़ा अभी भी पिघल रहा था।
किनारे पर हल्का-सा पानी का दाग।
कल रात उसने रखा था।
रात के ग्यारह बजकर कुछ मिनट।
टीवी बंद करके उठा था।
गिलास भरा।
दो घूँट पीए।
बाकी छोड़ दिया।
फिर बोला—"सोने चलते हैं।"
मैंने कहा—"गिलास तो उठा लो।"
उसने कहा—"सुबह कर लेंगे।"
सुबह हुआ।
गिलास वहीँ।
दोपहर हुई।
गिलास वहीँ।
अब शाम हो गई।
गिलास अभी भी वहीँ।
मैंने सोचा—उठा लूँ।
धो दूँ।
पर हाथ नहीं बढ़ा।
क्योंकि ये सिर्फ़ गिलास नहीं था।
ये एक छोटा-सा समझौता था।
एक छोटी-सी जंग।
जो हम दोनों लड़ रहे थे—बिना बोले।
अगर मैं उठाती, तो मानो मैं हार मान रही हूँ।
अगर वो उठाता, तो मानो वो झुक गया।
और हम दोनों को ही ये लग रहा था कि जो पहले झुकेगा, वो हारा हुआ होगा।
तो गिलास वहीं रहा।
पानी अब गुनगुना हो गया।
बर्फ गायब।
और ऊपर हल्की-सी धूल जम गई।
मैं कुर्सी पर बैठ गई।
गिलास को घूरती रही।
फिर धीरे से बोली—
"अब तो बस करो।
एक गिलास पानी ही तो है।"
पर जवाब किसी ने नहीं दिया।
न गिलास ने।
न घर की खामोशी ने।
न उसने—जो अभी तक ऑफिस से लौटा नहीं था।
मैंने हाथ बढ़ाया।
गिलास उठाया।
एक घूँट पीया।
ठंडक अब नहीं थी।
स्वाद भी नहीं।
बस एक पुरानी आदत।
फिर गिलास सिंक में रख दिया।
पानी बहाया।
साफ़ किया।
सुखाकर रख दिया।
पर मन में कुछ टूटा नहीं।
न कुछ जीता।
बस एक आधा गिलास खत्म हुआ।
जैसे हमारा एक छोटा-सा हिस्सा भी खत्म हो गया हो।
अब मेज पर कुछ नहीं।
खाली।
साफ़।
और बहुत शांत।
शायद यही चाहिए था।
न गिलास।
न पानी।
न लड़ाई।
बस खाली मेज।
और थोड़ा सा सुकून।
कल सुबह फिर से कोई गिलास रखेगा।
शायद पूरा।
शायद आधा।
पर आज के लिए—बस इतना ही।