हिन्दूओं को अपने धर्म के विस्तार के लिए इस समय क्या कदम उठाना चाहिए?
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मेरा प्रस्ताव राष्ट्रीय स्तर पर एक हिन्दू बोर्ड के गठन करने का है। हिन्दू बोर्ड के गठन से हिन्दू धर्म तेजी से विस्तार करने लगेगा। इस समय भारत में हिन्दू धर्म जिस दशा से गुजर रहा है, उसमे विस्तार करना बहुत आगे की बात है। पहली चिंता यह है कि हिन्दू धर्म जिस तेजी से सिकुड़ रहा है, उसे रोका कैसे जाए। मैंने जो प्रस्ताव दिया है वह दोनों काम करेगा। पहले चरण में यह हिन्दू धर्म को सिकुड़ने से रोकेगा और दुसरे चरण में हिन्दू धर्म को विस्तार करने की शक्ति प्रदान करेगा।
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(1) हिन्दू बोर्ड क्या है इसका गठन कैसे होगा, और यह कैसे काम करेगा ?
(2) राष्ट्रिय सम्प्रदाय रजिस्ट्रार के आने से कैसे हिन्दू धर्म तेजी से विस्तार करना शुरू करेगा ?
(3) और कैसे हिन्दू बोर्ड के आने से विभिन्न राजनैतिक दल छद्म धार्मिक प्रोपेगेंडा खड़ा करके धार्मिक अनुयायियों को ठगने की शक्ति खो देंगे।
(4) हिन्दू बोर्ड के गठन के लिए आप क्या कदम उठा सकते है ?
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[ टिपण्णी : प्रस्तावित हिन्दू बोर्ड का प्रभाव बहु आयामी है, और इसके सभी पहलुओ एवं प्रभावों का सम्पूर्ण आकलन करना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। किन्तु जहाँ तक मैं देखता हूँ, हिन्दू बोर्ड का गठन वह निर्णायक बिंदु होगा जहाँ से सदियों बाद सनातन हिन्दू धर्म फिर से विस्तार करना शुरु करेगा।
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सामान्यतया धार्मिक प्रवचनों और उपदेशो से धर्म के विस्तार करने एवं सिकुड़ने का कोई लेना देना नहीं होता है। हिन्दू धर्म में जो संत, मनीषी आदि हुए उनमें से ज्यादातर ने धार्मिक संगठन के प्रशासन को मजबूत बनाने पर ज्यादा भार नहीं दिया। और जिन धार्मिक गुरुओ ने प्रशासनिक प्रक्रियाओ पर भार दिया उन्हें कार्यकर्ताओ ने गंभीरता से नहीं लिया।
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आज भी हिन्दू धर्म के कार्यकर्ताओ का ज्यादातर जोर धार्मिक उपदेशो एवं प्रवचन वगेरह पर रहता है, प्रशासनिक प्रक्रियाओ पर नहीं। इस वजह से हिन्दू धर्म का प्रशासन निरंतर कमजोर होता गया और जब उसका सामना किसी ऐसे धर्म से हुआ जिसके पास ज्यादा बेहतर प्रशासनिक प्रक्रियाएं थी तो हिन्दू धर्म सिकुड़ने लगा।
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उदाहरण के लिए एक निश्चित दिन, निश्चित समय और निश्चित स्थान पर अनिवार्य रूप से इकट्ठे होना ( एकत्रीकरण ) किसी भी संगठन को खड़ा करने के लिए एक शक्तिशाली प्रक्रिया है। गेदरिंग की वजह से इस्लाम में शक्ति आयी और उसने विस्तार करना शुरू किया। इसी विस्तार के दौरान इस्लाम हिन्दू धर्म के सम्पर्क में आया और हिन्दू धर्म ने अपनी जमीन एवं अनुयायी गंवाने शुरु किये।
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दूसरा मोड़ 1200 ईस्वी के आस पास तब आया जब इसाईयों को जूरी सिस्टम मिला और उसके बाद से अगले 400 वर्षो में ईसाई जहाँ जहाँ गए उन्होंने इस्लाम का अधिग्रहण किया। किन्तु ग्रंथियों को चुनने का अधिकार होने के कारण सिक्खो ने काफी कम संख्या में होने के बावजूद मुगलों एवं गोरो का अच्छे से प्रतिरोध किया।
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प्रस्तावित हिन्दू बोर्ड में इसी तरह की कई प्रक्रियाएं है, जो कई पहलुओ से हिन्दू धर्म को विस्तार करने की शक्ति प्रदान करेगी। यहाँ पाठक कृपया इस बात पर ध्यान दें कि इस क़ानून को हिन्दू धर्म के प्रशासन को सुधारने के नजरिये से लिखा गया है, और हिन्दू धर्म की विभिन्न धार्मिक परम्पराओं, रीतियों, संस्कृतियों, मीमांसाओ, उपदेशो आदि में इसका कोई दखल नहीं है। यह क़ानून उन्हें छूता भी नहीं । ]
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( खंड - क )
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(1) हिन्दू बोर्ड का गठन एवं इसकी रूपरेखा :
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हिन्दू बोर्ड एक प्रस्तावित क़ानून है। यदि भारत के प्रधानमंत्री इसे गेजेट में प्रकाशित कर देते है तो 30 दिनों के भीतर इसका गठन हो जायेगा। इसके संगठनात्मक ढाँचे की रूप रेखा एवं प्रक्रिया निम्नलिखित है :
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1.1. इस क़ानून के गेजेट में छपने से राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड नामक संस्था का गठन होगा, और इसके प्रत्येक सदस्य को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। इस संस्था के सदस्यों को हिन्दू बोर्ड मेम्बर या हिन्दू संघ सदस्य कहा जाएगा।
1.2. भारत के निम्नलिखित नागरिक हिन्दू बोर्ड के सदस्य हो सकेंगे :
उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है।
सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो के अनुयायी भी यदि इस बोर्ड में जुड़ना चाहते है तो इसकी सदस्यता ले सकेंगे।
यह क़ानून इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, पर कोई दायित्व या प्रतिबन्ध नहीं लगाता। इन धर्मो के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे।
स्पष्टीकरण : भारत में निवास करने वाला जो भी व्यक्ति खुद को हिन्दू कहता है, वह इस बोर्ड का स्वत: सदस्य होगा। किन्तु यदि कोई व्यक्ति स्वयं को गैर हिन्दू घोषित करता है या अन्य धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है तो उसका नाम बोर्ड की मेंबर लिस्ट से हटा दिया जाएगा। सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो का कोई अनुयायी भी यदि खुद को गैर हिन्दू घोषित नहीं करता है तो वह बोर्ड मेम्बर होगा।
एक अनुमान के अनुसार इस बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में 70 से 80 करोड़ वयस्क हिन्दू होंगे। इस तरह धर्म के प्रबंधन के लिहाज से यह दुनिया का सबसे बड़ा पंजीकृत सदस्यों का संघ होगा। तथा इस बोर्ड के सभी सदस्यों के पास बोर्ड बनाने के वोटिंग राइट्स होंगे। अत: मतदाताओ की संख्या के आधार पर भी यह सबसे बड़ी संस्था होगी।
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क्या भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में धार्मिक आधार पर ऐसी संस्था का गठन करना संवैधानिक है ?
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हाँ। यह पूरी तरह से संवैधानिक है। यह धार्मिक संस्था नहीं है, बल्कि धार्मिक संस्थाओ का प्रबंधन करने वाली संस्था है। चूंकि भारत एक सेकुलर देश है, अत: सरकार स्वयं किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन पर खर्चा एवं अतिरिक्त भार नहीं दे सकती। किन्तु विभिन्न धर्मो के प्रबंधन के लिए क़ानून बना सकती है, ताकि अमुक धर्म के अनुयायी अपनी संस्थाओ का प्रबंधन विधिवत रूप से कर सके।
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भारत में पहले से ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ( SGPC ) के नाम से ऐसा संगठन है। यह संस्था गोल्डन टेम्पल एवं उसके अधीन अन्य गुरूद्वारो का प्रबंधन करती है। ग्रंथियों को चुनने के लिए इलेक्शन होते है, और सिक्खों के पास इसके वोटिंग राइट्स है। सिर्फ सिक्ख पंथ का अनुयायी ही SGPC में मतदाता हो सकता है। SGPC का गठन सरकारी आदेश से हुआ था। जब गोरो ने गोल्डन टेम्पल पर उदासी महंतो के माध्यम से कंट्रोल लेने की कोशिश शुरू की तो सिक्खों ने आन्दोलन किया और 1925 में गोरो को यह क़ानून गेजेट में छापने के लिए बाध्य कर दिया था।
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आज SGPC संसद द्वारा अनुमोदित एक क़ानून है, और इसमें सरकार कोई भी संशोधन ला सकती है। अभी हाल ही में मोदी साहेब ने इसमें कुछ संशोधन किये है। उन संशोधनों पर फिर किसी जवाब में कहेंगे। वक्फ बोर्ड भी इसी तरह की कानूनी संस्था है, जो मदरसों एवं वक्फ के क्षेत्राधिकार की संस्थाओ का प्रबंधन करती है। हिन्दू बोर्ड का यह क़ानून भी प्रधानमंत्री द्वारा ही लाया जाएगा, और गेजेट में छापने से भारत में लागू होगा। अत: हिन्दू बोर्ड का गठन पूरी तरह कानूनी एवं संवैधानिक है। इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री इस पर हस्ताक्षर करके इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है।
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1.3. यह क़ानून किसी भी प्रकार से उन नागरिको पर हिन्दू होने का लेबल नही लगाता जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नहीं कहलाना चाहते। उदाहरण के लिए यदि कोई जैन या सिक्ख पंथ का अनुयायी इसमें नामांकित होता है तो भी उसकी कानूनी-धार्मिक-सामाजिक पहचान प्रवृत कानूनों के अनुसार जैन / सिक्ख धर्म के अनुयायी के रूप में बनी रहेगी
स्पष्टीकरण : संविधान में अल्पसंख्यक को अतिरिक्त लाभ दिए जाने का प्रावधान होने के कारण सनातन संस्कृति के कई पंथ स्वयं को हिन्दू धर्म से अलग करने के लिए प्रेरित होते जा रहे है। 2013 में जैन धर्म ने अल्पसंख्यक होने का लाभ लेने के लिए स्वयं को हिन्दू धर्म से अलग किया और अभी लिंगायत भी हिन्दू धर्म से अलग हो गये है।
अत: बिंदु 3 सनातन संस्कृति से प्रतीकात्मक रूप से अलग हुए भारतीय संस्कृति के सभी पन्थो के अनुयायियों को यह सुविधा देता है कि वे अपनी पहचान बनाए रखते हुए इस बोर्ड की सदस्यता ले सके। इस तरह यह बोर्ड बिना किसी विवाद के स्वैच्छिक रूप से सनातन संस्कृति के सभी पन्थो के अनुयायियों को एक जगह लेकर आता है।
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1.4. राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड ( Rashtriy Hindu Board = RHB ) की मुख्य कार्यकारिणी में 1 प्रमुख एवं 4 न्यासियो सहित कुल 5 व्यक्ति होंगे। हिन्दू बोर्ड का प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान एवं कार्यकारिणी के शेष 4 सदस्यों को न्यासी कहा जाएगा। हिन्दू संघ प्रधान वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा। यदि आप इस बोर्ड के मेंबर है और संघ प्रधान के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, तो वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर उसे निकालने और किसी अन्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकते है। आप अपनी अपनी स्वीकृति SMS, ATM या मोबाईल एप से भी दे सकेंगे।
स्पष्टीकरण : यह प्रावधान लोकतंत्र की स्थापना करता है। बोर्ड प्रमुख यानी संघ प्रधान चुन कर आएगा और यदि वह ठीक से काम नहीं कर रहा है तो हिन्दू नागरिक उसे किसी भी समय निकालने के लिए वोट भी कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि SGPC में सिक्खों के पास सिर्फ चुनने का अधिकार है, किन्तु निकालने का अधिकार नहीं है।
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जिस भी व्यवस्था में सिर्फ चुनने का अधिकार होता है किन्तु निकालने का अधिकार नहीं होता वहां पर जनता जिसे चुनती है वह जीतने के साथ ही चोरी-चकारी शुरू कर देता है। फिर 5 साल तक पीड़ित होने के बाद जनता जिस नए आदमी को चुनती है वह पद पर आकर लूटपाट शुरू करता है। और जब 5 साल बाद जनता नए आदमी को मौका देती है तो नया व्यक्ति पद सँभालते ही डाके डालने लग जाता है। तब जनता परेशान होकर सोचती है तो इससे तो चोर ही ठीक था। बस इसी तरह का रोटेशन चलता है।
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निकालने का सिस्टम नहीं होने वाली व्यवस्था में ड्रामे करने वाले, झूठ बोलने वाले और स्टंट दिखाने वाले व्यक्ति लोगो को एक बार चकमा देकर आसानी से चुन लिए जाते है। और फिर एक बार चुन लिए जाने के बाद जनता को इन्हें 5 साल भुगतना ही पड़ता है। मतलब जनता को सबसे कम बदतर को चुनना पड़ता है। इसका साक्षात उदाहरण आप भारत की राजनीती में देख सकते है।
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किन्तु हिन्दू बोर्ड में हिन्दू नागरिको के पास दोनों प्रक्रियाएं होगी। वे चुन भी सकेंगे और निकाल भी सकेंगे। अत: बदतर व्यक्ति पद पर रह नहीं पायेगा। यदि बेहतर होगा तो टिकेगा वर्ना साल छह महीने में निष्काषित कर दिया जाएगा।
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(2) हिन्दू बोर्ड का क्षेत्राधिकार :
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2.1. यदि एवं जब भारत के "सभी" मतदाताओ में से 45 करोड़ मतदाता धारा 30 में दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निचे दिए 4 देवालयों के भूखंड RHB को सौंप देते है तो हिन्दू बोर्ड इन मंदिरों की देख रेख करेगा :
राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या
कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा
काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी
अमरनाथ देवालय, कश्मीर
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2.2. इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर इस क़ानून की धारा 30 में दिए गए प्रावधानों का प्रयोग करते हुए प्रधानमन्त्री देश के सभी मतदाताओ के 4 देवालयों के लिए 4 अलग अलग देश व्यापी जनमत संग्रह करवाएंगे, जिसमें यह प्रश्न रखा जाएगा कि क्या उपरोक्त भूखंड हिन्दू बोर्ड को सौंप दिए जाने चाहिए या नहीं। यदि देश के 45 करोड़ मतदाता इसके लिए अपनी स्वीकृति हाँ के रूप में दे देते है, तो ही प्रधानमंत्री ये 4 भूखंड हिन्दू बोर्ड को सौंपेगे, अन्यथा नही।
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2.3. यह क़ानून उपरोक्त 4 देवालयों के भूखंडो के अतिरिक्त देश के अन्य किसी भी भूखंड पर - जिस पर मन्दिर, मस्जिद, चर्च होने का दावा हो या स्वामित्व को लेकर विवाद हो के स्वामित्व के निर्धारण हेतु धारा 30 का इस्तेमाल करने पर स्पष्ट रूप से प्रतिबन्ध लगाता है। इन 4 भूखंडो के अलावा अन्य किसी भी भूखंड पर इस तरह की देशव्यापी रायशुमारी नही की जाएगी।
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2.4. हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है। किन्तु बोर्ड उन देवालयों का अधिग्रहण / प्रबंधन नहीं करेगा जिनकी देख-रेख देवालय के मालिक RHB से नहीं कराना चाहते। सभी प्रकार की मस्जिदे, चर्च, गुरूद्वारे, बौद्ध तीर्थ स्थल एवं जैन तीर्थ स्थल आदि हिन्दू बोर्ड के दायरे से बाहर रहेंगे।
स्पष्टीकरण : इस क़ानून की धारा 30 में जनमत संग्रह की प्रक्रिया दी गयी है। यह जनमत संग्रह देश के सभी नागरिको के बीच कराया जाएगा, न कि सिर्फ हिन्दू नागरिको के लिए। जिस भूखंड पर बहुमत प्राप्त हो जाता है वह भूखंड हिन्दू बोर्ड को हस्तांतरित कर दिया जाएगा। यदि जनमत संग्रह में 45 करोड़ नागरिक किसी भूखंड को हस्तांतरित करने के लिए सहमती नहीं देते है तो भूखंड हस्तांतरित नहीं होंगे।
यह प्रावधान इन चारो भूखंडो के विवाद के स्वामित्व को लोकतान्त्रिक तरीके से हल करता है। इसके बाद कोर्ट में चल रहे मामलों का इसमे कोई दखल नहीं रह जाएगा। हस्तांतरण के बाद हिन्दू बोर्ड इन भूखंडो पर देवालयों का निर्माण करेगा और इनका प्रबंधन भी करेगा।
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2.5. हिन्दू बोर्ड का कोई भी सदस्य जिसकी आयु 30 वर्ष से अधिक हो, वह हिन्दू संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड के न्यासी पद के लिए आवेदन कर सकेगा। कोई व्यक्ति बोर्ड के न्यासी के साथ साथ संघ प्रधान के रूप में भी उम्मीदवार हो सकता है।
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2.6. कोई भी बोर्ड मेम्बर किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर संघ प्रधान या बोर्ड के किसी भी न्यासी के उम्मीदवारों के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता (बोर्ड मेम्बर) की हाँ दर्ज करेगा। पटवारी मतदाता की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम व मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है। कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी हाँ SMS, ATM, मोबाईल एप से दर्ज कर सके।
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2.7. यदि हिन्दू संघ प्रधान पद के किसी उम्मीदवार को 25 करोड़ से अधिक बोर्ड मेम्बर्स की स्वीकृति मिल जाती है और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन संघ प्रधान की स्वीकृतियों से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमन्त्री उसे नए संघ प्रधान के रूप में नियुक्त कर सकते है।
स्पष्टीकरण : यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि देश का कोई भी हिन्दू नागरिक संघ प्रधान के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर सके। ऐसा व्यक्ति कोई भी हो सकता है। भारत का कोई संत हो सकता है जो धर्म क्षेत्र में काम कर रहा हो। कैबिनेट स्तर का कोई सचिव हो सकता है। किसी संगठन या राजनैतिक दल का नेता हो सकता है, या कोई अन्य ख्यात प्रशासक या सामाजिक कार्यकर्ता हो सकता है। कृपया इस बात पर ध्यान दें कि संघ प्रधान हिन्दुओ का कोई धार्मिक गुरु नहीं है बल्कि प्रशासकीय मुखिया है। इसका क्षेत्राधिकार सिर्फ दान से प्राप्त धन एवं हिन्दू संस्थाओ का प्रबंधन होगा। धर्म की व्याख्या करना एवं धार्मिक आदेश निकालना इसके क्षेत्राधिकार में नही होगा।
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वह अपना आवेदन करने के बाद हिन्दू नागरिको के सामने अपना एजेंडा रखेगा कि वह किस तरह से प्रशासन चलाएगा कि हिन्दू संस्कृति का सरंक्षण एवं प्रसार हो। अनुमोदनो की प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी, और नागरिक किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार को अनुमोदन दे सकेंगे। जिसे 25 करोड़ से अधिक मत मिल जायेंगे वह हिन्दू संघ प्रधान बनेगा।
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(3) हिन्दू बोर्ड एवं संघ प्रधान की गतिविधियाँ :
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3.1. संघ प्रधान और न्यासी हिन्दू बोर्ड के संचालन और कर्मचारियों के प्रबंधन लिए जरुरी नियम बनाएंगे। संघ प्रधान के सभी निर्णयों को कम से कम दो न्यासियों के अनुमोदन की ज़रूरत होगी।
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3.2. बोर्ड किसी भी भारतीय व्यक्ति या गैर व्यक्ति भारतीय इकाई या विदेशी हिन्दू से दान प्राप्त कर सकता है, किन्तु विदेशी इकाई से नहीं । बोर्ड किसी व्यवसाय आदि में भी शामिल हो सकता है। जैसे कोई उद्योग, निगम, संस्था आदि।
स्पष्टीकरण : ऊपर दिए गए चार देवालयों और वे देवालय जो विभिन्न देवालय मालिको ने बोर्ड को सौंप दिए है में आने वाले दान का प्रबंधन संघ प्रधान करेगा। संघ प्रधान विभिन्न धार्मिक योजनाओ का खाका और उसका बजट बनाकर सार्वजनिक कर सकता है, और इसके लिए दान जुटा सकता है।
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संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड निम्नलिखित संभावित कार्य करेगा :
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(A) संघ प्रधान मुख्य धारा से कटे हुए उन सुदूर इलाको में अस्पताल एवं स्कूल खोल सकता है जहाँ पर शिक्षा-चिकित्सा नहीं है। फिलहाल इन रिमोट एरिया में मिशनरीज इस तरह के परोपकारी कार्य करके बड़े पैमाने पर धर्मान्तर कर रही है। हिन्दू बोर्ड के आने से वह प्राप्त दान से बड़े पैमाने पर आदिवासी-वंचित इलाको में स्कूल-अस्पताल सकेगा जिससे मिशनरीज के विस्तार का सबसे बड़ा रास्ता बंद हो जाएगा।
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मिशनरीज को टक्कर देने वाली इस तरह की गतिविधि सिर्फ हिन्दू बोर्ड जैसी संस्था ही कर सकती है। संत आसाराम जी बापू, संत राम रहीम जी, संत रामपाल जी जैसे निजी सम्प्रदाय यदि मिशनरीज के काम में दखल देंगे तो मिशनरीज उन्हें यौन शोषण के आरोपों में फंसा कर अंदर कर देने में सक्षम है। आज भारत में सिर्फ वही सम्प्रदाय / संत पनप सकता है, जो धर्म के नाम पर अपने अनुयायियों को सिर्फ डायलॉग सुनाता हो। यदि वह स्कूल-अस्पताल-दवाइयाँ जैसे काम करेगा तो मिशनरीज उसे गिरा देंगे।
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किन्तु हिन्दू बोर्ड कानूनी रूप से इतनी शक्तिशाली संस्था होगी कि इसे गिराया नहीं जा सकेगा। तो जैसे जैसे हिन्दू बोर्ड अपनी गतिविधियों के विस्तार करेगा वैसे वैसे मिशनरिज के परोपकार कार्यो की जड़े उखड़ने लगेगी, और नतीजे में धर्मान्तरण में भी कमी आएगी। और एक पॉइंट के बाद जब मिशनरीज के पाँव उखड़ जाते है तो हिन्दू धर्म छोड़कर जा चुके नव ईसाई फिर से हिन्दू धर्म में कन्वर्ट होना शुरू करेंगे।
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क्योंकि उन्हें हिन्दू बनने से हिन्दू बोर्ड में वोटिंग राइट्स मिलेंगे, स्कूल मिलेंगे, अस्पताल मिलेंगे, दवाइयाँ मिलेगी आदि। इस समय उन लोगो को हिन्दू बने रहने में कोई फायदा नहीं है, किन्तु कन्वर्ट होने से वास्तविक लाभ मिल रहे है। सिर्फ व्हाट्स एप पर भारत माता की जय एवं वन्दे मातरम का नारा लगवाकर उन्हें हिन्दू धर्म में बनाए नहीं रखा जा सकता। क्योंकि उनमे से ज्यादातर ने अभी तक व्हाट्स एप, फेसबुक आदि के बारे में सुना नहीं है।
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(B) भारत में पिछले 100 साल में धार्मिक आख्यानो का जितना प्रचार संतो, गुरुओ, कथा वाचको ने किया अकेले गीता प्रेस का योगदान इन सबके जोड़ से कई गुना ज्यादा है। गीता प्रेस ने भारत के हर घर तक धार्मिक ग्रंथो को बेहद सस्ते मूल्य में पहुँचाया। हाल ही में गीता प्रेस गोरखपुर वित्तीय संकट के कारण मुश्किलों में आ गयी थी। इस तरह की संस्था अपने बूते पर जब तक चल रही है तब तक चल रही है। यदि कोई संकट आता है तो हिन्दू धर्म में ऐसा कोई मिकेनिज्म नहीं है जो इनकी मदद कर सके। जहाँ सब की जिम्मेदारी होती है, वहां किसी की जिम्मेदारी नहीं होती। हिन्दू बोर्ड इस तरह के संकट में ऐसी धार्मिक संस्थाओ की मदद करने के लिए कदम उठा सकेगा।
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(C) हिन्दू बोर्ड गुरुद्वारों की तर्ज पर आवश्यकता नुसार जरुरतमंदो के लिए लंगर आदि चलाने की व्यवस्था शुरू कर सकता है। हिन्दू नागरिको को क़ानून के दायरे में रहकर हथियारों का शिक्षण देना, संस्कृत भाषा एवं दुर्लभ ग्रंथो को सरंक्षित करने के लिए कदम उठाना आदि को शामिल करते हुए और भी इसी तरह के सैंकड़ो धार्मिक-परोपकारी कार्य है जिन्हें हिन्दू बोर्ड व्यवस्थागत रूप से कर सकता है। वह जितना अच्छा कार्य करेगा, उसी अनुपात में दान में वृद्धि होगी। जैसे जैसे हिन्दू बोर्ड अपना प्रबंधन सुधरेगा वैसे वैसे अन्य बड़े मंदिर भी स्वैच्छिक रूप से अपना प्रबंधन हिन्दू बोर्ड को सौंपना शुरू कर देंगे।
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3.3. संघ प्रधान लिखित परीक्षा द्वारा 1000 दिनों की अवधि के लिए पुरोहितों एवं अन्य कर्मचारियों की भर्ती करेगा। संघ प्रधान विशेष कार्यों के लिए बाहरी ठेकेदारों को ठेके दे सकता है।
स्पष्टीकरण : एक महत्त्वपूर्ण बदलाव यह आएगा कि जिन देवालयों एवं संस्थाओ का प्रबंधन हिन्दू बोर्ड करेगा उनमे पुरोहितो एवं पुजारियों के रूप में दलितों एवं पिछड़ो की नियुक्ति का रास्ता खुल जाएगा। सावरकर ने दलितों को पुजारी बनाने के लिए गंभीर प्रयास किये थे, किन्तु देवालयों के मालिकों एवं ट्रस्टियों के प्रतिरोध के कारण मामला आगे नही बढ़ा। चूंकि हिन्दू बोर्ड में दलितों आदि को भी बराबर वोटिंग राइट्स होंगे, अत: सभी देवालयों के प्रबंधन में सभी हिन्दू एक स्तर पर बरते जायेंगे।
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3.4. संघ प्रधान इस सम्बन्ध में विधिवत पाठ्यक्रम अनुमोदित करेगा कि पुजारी बनने के लिए व्यक्ति को किन पुस्तको, शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है, एवं उसका आचार-व्यवहार ( मद्य निषेध-मांस निषेध आदि ) क्या होगा।
स्पष्टीकरण : किन्तु हिन्दू बोर्ड उन देवालयों में दखल नहीं करेगा, जो विभिन्न धार्मिक ट्रस्टो द्वारा चलाये जा रहे है, या उनके ट्रस्टी अपने देवालय का प्रबंधन हिन्दू बोर्ड से नही कराना चाहते। अमुक मंदिरों में ट्रस्टियों के नियम क़ानून ही लागू होंगे हिन्दू बोर्ड के नही। इस तरह यह क़ानून स्थापित धार्मिक संस्थाओ एवं देवालयों में कोई दखल नही करता।
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(4) हिन्दू बोर्ड के सदस्यों के मतदान अधिकार :
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4.1. प्रत्येक व्यक्ति जो हिन्दू है और RHB का ड्राफ्ट राजपत्र में छपने की दिनांक पर 18 वर्ष से ऊपर की आयु का है, राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड का मतदाता सदस्य होगा। इस हिन्दू बोर्ड में गैर-हिन्दू मतदाता सदस्य नहीं होंगे। शब्द हिन्दू में हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि सम्प्रदायों के अनुयायी भी शामिल है, जिन सम्प्रदायों का उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप रहा है ।
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4.2. यदि कोई व्यक्ति स्वयं को गैर-हिन्दू कहता है और बोर्ड का सदस्य नहीं बनता तो उसका अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा इस क़ानून द्वारा प्रभावित नहीं होगा।
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4.3. यदि कोई ईसाई या मुस्लिम हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी उसकी पहचान की पुष्टि करके अनुमोदन करेगी। जूरी के अनुमोदन के बाद यदि सभी न्यासी भी इसका अनुमोदन करते है तो संघ प्रधान उसका नाम बोर्ड की सदस्य सूची में जोड़ेगा। नाम तब तक नहीं जोड़ा जायेगा जब तक कम से कम 100 बोर्ड मेम्बर्स की जूरी बहुमत द्वारा स्वीकृति नहीं देती।
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4.4. यदि कोई व्यक्ति हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य किसी धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है तो उसका मताधिकार निलम्बित कर दिया जाएगा। यदि धर्मान्तरित हुआ अमुक व्यक्ति एक वर्ष के भीतर फिर से हिन्दू धर्म में पुन: धर्मान्तरित नहीं होता है तो उसका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से हटा दिया जाएगा। और यदि वह दो बार किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है तो दूसरी बार उसका नाम बिना 1 साल इंतज़ार किये हटा दिया जायेगा। विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय अंतिम होगा।
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4.5. यदि किसी व्यक्ति की माता या पिता में से कोई एक हिन्दू है और वह स्वयं को हिन्दू घोषित करता है तो वह 18 वर्ष की आयु से हिन्दू बोर्ड का मतदाता बन जाएगा।
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(5) विवादों एवं मामलो का जूरी द्वारा निपटान :
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5.1. जूरी प्रशासक जिले की हिन्दू बोर्ड मेम्बर लिस्ट में से 30 सदस्यीय महाजूरी मंडल की नियुक्ति करेगा। इनमे से हर 10 दिन में 10 सदस्य रिटायर होंगे और नए 10 सदस्यो का चयन मेम्बर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा कर लिया जाएगा। यह महाजूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा। महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 500 रू एवं यात्रा व्यय मिलेगा।
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5.2. यदि संघ प्रधान, न्यासी या बोर्ड के स्टाफ से सम्बंधित कोई भी मामला है तो वादी अपने मामले की शिकायत महाजूरी मंडल के सदस्यों को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल के सदस्य मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है, अथवा इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए जूरी मंडल के गठन का आदेश दे सकते है।
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5.3. मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच कितने सदस्यों की जूरी बुलानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा 30 से 55 वर्ष के बीच की आयुवर्ग के सदस्यों का चयन करके एक जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा।
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5.4. अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नारको टेस्ट या नौकरी से निकालने का निर्णय लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी के फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी होगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील उच्च जूरी मंडल में कर सकते है।
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5.5. जिला जूरी मंडल के निर्णय की अपील राज्य जूरी मंडल में एवं राज्य जूरी मंडल के फैसले की अपील राष्ट्रीय जूरी के सामने की जा सकेगी। प्रवृत कानूनों के अनुसार फैसले की अपील जिला / उच्च / उच्चत्तम न्यायालय में भी की जा सकेगी।
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5.6. यदि 75% या उससे अधिक जूरी सदस्य आरोपी कर्मचारी को नौकरी से निकालने या जुर्माना लगाने का निर्णय देते है तो संघ प्रधान अमुक कर्मचारी को निकाल सकता है या उससे जुर्माना वसूल सकता है। यदि शिकायतकर्ता को लगता है कि संघ प्रधान ने जूरी सदस्यों के निर्णय का ठीक से पालन नहीं किया है, तो वह हिन्दू बोर्ड के मतदाताओं से मांग कर सकता है कि वे धारा 15 में दी गयी वोट वापसी प्रक्रिया का प्रयोग करके हिन्दू संघ प्रधान को नौकरी से निकालने की सहमती दें।
स्पष्टीकरण : यह प्रावधान हिन्दू देवालयों एवं संस्थाओ में भ्रष्ट जजों के दखल को रोकता है। हिन्दू बोर्ड से सम्बंधित जो भी मामले आयेंगे उसकी सुनवाई हिन्दू नागरिको की जूरी करेगी। इस प्रावधान के कारण भ्रष्ट जज हिन्दू देवालयों के प्रशासन को तोड़ने में कामयाब नहीं हो पायेंगे।
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( खण्ड - ख )
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हिन्दू बोर्ड के प्रस्तावित क़ानून में दो खंड है। पहले खंड का विवरण मैंने ऊपर दिया है। दुसरे खंड का ब्यौरा निचे दिया जा रहा है। सम्प्रदायों को प्रबंधित करने वाला यह खंड ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इसके मैंने कुछ हिस्से और प्रभाव यहाँ दिए है। विस्तृत विवरण देखने के लिए पूरा ड्राफ्ट पढ़ें। ड्राफ्ट का लिंक इस जवाब के अंत में दिया गया है।
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सनातन संस्कृति के विभिन्न सम्प्रदायों का प्रबंधन :
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यह इस क़ानून का सबसे महत्त्वपूर्ण खंड है। इस खंड के तहत प्रधानमंत्री एक सनातन संस्कृति के सम्प्रदायों के लिए एक रजिस्ट्रार की नियुक्ति करेंगे।
यह रजिस्ट्रार हिन्दू संघ प्रधान के अधीन नहीं होगा, और सीधे हिन्दू बोर्ड मेम्बर्स के रूप में करोड़ो नागरिको के कंट्रोल में रहेगा। यह खंड उन सभी देवालयों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करके श्रद्धालुओ के अधीन करेगा, जिन्हें भ्रष्ट जजों के माध्यम से सरकार ने हथिया लिया है। साथ ही भारत के सभी सम्प्रदायों के अनुयायियों को उन सम्प्रदायों के ट्रस्टियों को चुनने एवं निकालने के वोटिंग राइट्स मिलेंगे जिस सम्प्रदाय से आप जुड़े हुए है।
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उदाहरण के लिए यदि आप आर्य समाजी या स्वामी नारायण सम्प्रदाय के अनुयायी है तो आप अमुक सम्प्रदाय के मतदाता सदस्य बनेंगे। राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड की वोट वापसी पासबुक में एक सेक्शन ट्रस्टो का भी होगा। यदि आप किसी ट्रस्ट के मतदाता सदस्य है तो अपने ट्रस्ट के ट्रस्टियों एवं अध्यक्ष को बदलने के लिए किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दर्ज कर सकते है।
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(1) संप्रदाय रजिस्ट्रार की नियुक्ति एवं कार्यक्षेत्र :
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1.1. प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय सनातन संप्रदाय रजिस्ट्रार ( National Sanatan Sect Registrar ) नामक अधिकारी की नियुक्ति करेंगे, जो उन सम्प्रदायों एवं उनके अनुयायियों की सदस्य सूची बनाने एवं उन्हें लोकतांत्रिक रूप से प्रबंधित करने में व्यवस्थागत सहयोग करेगा जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन संस्कृति है, तथा वे एक पंथ या सम्प्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त धार्मिक ट्रस्ट है। ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों में जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी भारतीय संप्रदाय शामिल है।
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रजिस्ट्रार का ट्रस्ट की धार्मिक मान्यताओ में कोई दखल नहीं होगा। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से SGPC द्वारा शासित है, अत: सिक्ख पंथ रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेगा। इसके अलावा इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, भी रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर होंगे।
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1.2. वे सभी धार्मिक ट्रस्ट जिनका किसी देव स्थान या देवालय पर स्वामित्व है, उन्हें जिला सम्प्रदाय रजिस्ट्रार में अपने ट्रस्ट का पंजीयन कराना होगा। ऐसे देवालय जो किन्ही व्यक्तियों के निजी स्वामित्व में है, रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार में नहीं आयेंगे।
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1.3. जिला रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्ट से शुल्क के रूप में 1000 रूपये प्रति वर्ष लेगा। रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्टी से भी 1000 रूपये प्रति ट्रस्ट के हिसाब से जितने ट्रस्टों का वह ट्रस्टी है वार्षिक शुल्क लेगा।
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1.4.अध्यक्ष तथा ट्रस्टी ट्रस्ट के स्वामित्व में जितनी संपत्ति है उसके ब्यौरे की सूची जिला रजिस्ट्रार को देंगे। इस सूची में ट्रस्ट के स्वामित्व वाली भूमि, इमारतें, नकदी, शेयर, बांड, सोना, चांदी, फर्नीचर, किसी को दिया या किसी से लिया गया कर्ज, संपत्ति, कोई अन्य मूल्यवान प्रतिभूति आदि एवं इनका बाजार मूल्य शामिल है। कोई भी ट्रस्टी यह सूची रजिस्ट्रार को दे सकता है, एवं सभी ट्रस्टी अलग अलग भी यह सूची दे सकते है। सूची मे विचलन होने पर जूरी इसका निपटान करेगी।
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1.5. जिला रजिस्ट्रार अपने जिले के प्रत्येक ट्रस्ट का नाम, क्रम संख्या, ट्रस्ट विलेख, सभी ट्रस्टियों के नाम, ट्रस्ट की संपत्तियां (मय बाजार मूल्य) आदि की पूरी अद्यतन जानकारी ट्रस्ट के लिए बनायी गयी जिला वेबसाइट पर रखेगा। यह सूचना राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बनायी गयी ट्रस्ट की राष्ट्रीय वेबसाइट पर भी रखी जायेगी।
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(2) नए मतदाता सदस्यों का प्रवेश तथा निष्कासन :
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2.1. यदि कोई मतदाता सदस्य किसी अन्य धर्म में परिवर्तन कर लेता है या किसी ऐसे संप्रदाय में शामिल हो जाता है जो कि परंपरागत रूप से अथवा ट्रस्ट के दस्त