___निशाग्नि___
मन के पीर, जिया के रीढ़ बन,
स्मृतियाँ सारी उभर रही हैं हृदय-पटल पर।
आँखों के अश्रु सब सूख,
कर्पूर की बाती जस
जलन रहे हैं हर दस्तक पर।
आज इन नेत्रों में निद्रा नहीं,
निशाग्नि नाच रही है मेरे मस्तक पर,
अंतर्मन की चेतना भी
हिल उठी है अब तो अंतस पर।