यादों की कैद।
ना हमें नींद आती है, ए यादें सोने कहां देती हैं,
रात-दिन ये बेचैनियाँ चैन से रोने कहां देती हैं।
सूनी राहों में गूंजे तेरी आहट का कोई धोखा,
धुंधली सी परछाइयाँ सच को खोने कहां देती हैं।
हमने चाहा था भुला दें तेरे हर लम्हे की खुशबू,
ये बसी हुई महकें खुद को खोने कहां देती हैं।
वो जो वादे थे तेरे, उम्र भर साथ निभाने के,
अब वही टूटी सदा दिल को संजोने कहां देती हैं।
हम भी हँस लेते कभी इस बनावटी से जग में,
तेरी सच्चाई मगर झूठ को बोने कहां देती हैं।
अब तो आदत सी बनी इन तन्हा लम्हों के साथ,
“प्रसंग” ए खामोशियाँ तसल्ली होने कहां देती हैं।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर