यही हाल है।
महंगाई की मार में जीना कठिन यही हाल है,
कमाई से बड़ा अब हर एक सवाल यही हाल है।
वादों के मेले में सच की दुकानें बंद पड़ीं,
झूठों के चेहरे पर बस इक कमाल यही हाल है।
आँकड़ों की चादर से भूख को ढकने की कोशिश,
हकीकत के शहर में हर दिन बवाल यही हाल है।
जो ताली बजाते हैं सत्ता की हर बात पर,
उनकी आँखों में बसा हुआ जंजाल यही हाल है।
जनता की जेबों में बस कर्ज़ का बोझ बढ़ा है,
उम्मीदों के घर का टूटा सा हाल यही हाल है।
भाषणों की रोशनी में अंधेरा बढ़ता ही गया,
सच की हर आवाज़ का होता दर्द यही हाल है।
जो कहते हैं “सब ठीक है”, वो ही सबसे दूर खड़े,
प्रसंग कहे, जन-जीवन बेहाल यही हाल है।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर