मैं और मेरे अह्सास
वाइज
आज वाइज सुराही लिए बैठा हैं l
भरी महफिल जाम पिए बैठा हैं ll
रस्मों रिवाज की ओर जाते हुए l
सारे दरवाजे बंध किए बैठा हैं ll
ताउम्र तो रफ़ू कर नहीं सकते है l
जिंदगी का लबादा सिए बैठा हैं ll
क्या हुआ जो बेपरवाही से वो l
खुद की मरज़ी से जिए बैठा हैं ll
बेफिक्र बेदर्दी इंसान से सखी l
मोहब्बत अपनी दिए बैठा हैं ll
८-४-२०२६
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह