मैं एक नदी हूँ…
गगन को चूमती पर्वत की चोटी से जन्मी हूँ,
बर्फ़ की खामोशियों में पली हूँ…
चल पड़ी हूँ
एक अनजाने सफर पर,
अपनी मंज़िल की तलाश में।
पहाड़ों की बाहों में
खुद को समेटना चाहा था मैंने,
पर उसने धीरे से कहा—
"मैं तेरी मंज़िल नहीं…
सिर्फ़ तेरा पहला प्रेम हूँ।"
मैं मुस्कुराई भी नहीं…
बस चुपचाप बह चली।
दया, करुणा, समर्पण—
सब अपने साथ लिए,
बिना सवाल, बिना शिकायत
आगे बढ़ती रही।
जमीन से पूछा—
"क्या तुम मेरी मंज़िल हो?"
वो हँस पड़ी—
"नहीं… मैं तेरे सफर की साथी हूँ,
तुझे अभी बहुत दूर जाना है।"
कहीं मुझे पूजा गया,
कहीं मुझे इस्तेमाल किया गया,
और कहीं…
मेरी पवित्रता को ही तार-तार किया गया।
मैं फिर भी बहती रही…
हर दर्द को अपने भीतर समेटे।
मैंने फलक से पूछा—
"क्या तुम मेरी मंज़िल हो?"
वो मुस्कुराया—
"मैं तेरी मंज़िल नहीं…
बस तेरा शुभचिंतक हूँ।
तेरे सफर के उतार चढ़ाव और तेरे भटकाव को देख कर दर्द में हूं...."
उसकी ऊँचाइयों से गिरते आँसुओं को
आँचल में समेटे
मैं बढ़ती रही…
जाने किस ओर…
अब थक चुकी थी मैं…
हार चुकी थी…
बस थोड़ा ठहरना चाहती थी,
खुद में ही कहीं बिखरना चाहती थी…
तभी दूर…
एक असीम विस्तार नजर आया—
सागर…
उसे देखते ही
मेरी रूह मचल उठी…
और उसने पुकारा—
"आ जा…
मैं ही तेरी मंज़िल हूँ…
जहाँ तेरा हर दर्द समा जाएगा,
जहाँ तेरा हर सफर
पूरा हो जाएगा…"
मैं मुस्कुराई…
और पहली बार—
खुद को खो देने के लिए
तैयार हो गई।
मेरी मंजिल नहीं थी वो
मेरे अस्तित्व का अंत थी वो 😔
जब समझ आया तब तक देर हो चुकी थी ।💔
कल्पिता 🌻
दिल से दुनिया तक ❤️