मन एक बंजारा है
कभी यादों की गलियों में भटकता,
कभी ख्वाबों के शहर में घर बनाता।
ना कोई ठिकाना इसका,
ना कोई मुकाम तय,
जहाँ सुकून की आहट मिले,
वहीं कुछ पल ठहर जाता है।
कभी तेरी बातों की छाँव में,
कभी अपनी तन्हाई के साए में,
ये मन यूँ ही सफ़र करता रहता है
जैसे कोई बंजारा… बेपरवाह, बेनाम, बेख़बर।
- Nisha ankahi