श्याम पिया ठंडी हवा
कविता
शाम कि यह ठंडी हवा
जादू की पिटारें के खुलने के जैसा एहसास दिलाता है
दिन भर के थकावट के बावजूद में शाम के वक्त
खुले आसमान के नीचे बैठने का आनंद जन्नत से कम नहीं
जो ठंडी ठंडी हवा जैसे-जैसे गालों को छु
और बालों को उरा जाती है
ऐसा लगता है कि सारे दर्द और शिकायत ही मिट गया हो
इस ठंडी हवा को महसूस करके
और कुछ महसूस ही नहीं होता
और जैसे-जैसे शाम गुजरते जाती है
और रात आती जाती है
वैसे-वैसे आसमान में तारे खील खिलाने लगते हैं
और इस जगमांगते हुए तारे
हीलते हुए पेढ़ पैधो के पत्तियां
चलते हुए हवा सुकून से भर देती है
और इस पल में इंसान को कुछ और नहीं चाहिए
बस छत के दीवारों पर बैठे रहना
अपने पैरों को नीचे करते हुए
इस हवा को महसूस करते हुए
आसमान को देखते रहना
जले हुए धड़कन को ठंडक से भर देती है
और ऐ ठंडक सदीयो के दुआ से कम नहीं है
और मुझे कुछ देर ऐसे ही बैठे रहना है
इन हवाओं के साथ इन लम्हों में सारे गमों को भुलाकर
इन्हें महसूस करते हुए जीते रहना है
थकावटों से निकली हुई दुआओं को
कबूल होते देखते रहना है
और महसूस करना है
इन लम्हों को
और इन पलो में ठहेर जाना है