तुमने मुझे खामोश ही कर दिया, जबकि मुझे तो तुमसे ढेर सारी बातें करने की आदत थी। मैं हर छोटी-सी बात भी संभाल कर रखता था कि तुम्हें सुनाऊँगा। तुमसे बात करना मेरी रोज़ की सबसे ज़रूरी चीज़ हुआ करती थी जैसे सुबह की चाय या रात की नींद।
हर छोटी-सी बात, हर अजीब-सी सोच, सबसे पहले तुम्हारे साथ बाँटने का मन करता था, क्योंकि मुझे लगता था कि तुम सिर्फ सुनोगी नहीं, समझोगी भी। फिर धीरे-धीरे सब कुछ बदल गया - न वक्त बदला, न दिन। आज भी मेरे पास बातें उतनी ही होती हैं, लेकिन उन्हें कहने के लिए तुम नहीं होती।
मैं अक्सर फोन उठाकर तुम्हारा नाम देखने की अपनी आदत से लड़ता हूँ, फिर खुद को याद दिलाता हूँ कि अब तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं है। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की नहीं होती कि तुम चले गए, बल्कि इस बात की होती है कि तुम्हारी जगह कोई और कभी ले ही नहीं पाया।
लोग कहते हैं कि वक्त सब ठीक कर देता है, लेकिन कुछ लोग वक्त के साथ ठीक नहीं होते - वे बस चुप हो जाते हैं। मैं भी अब वैसा ही हो गया हूँ। बातें आज भी दिल में उतना ही शोर करती हैं, बस उन्हें सुनने वाला अब कोई नहीं है।