कभी यादों की दहलीज़ पर, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही,
मैं खुद से ही हो कर बेख़बर, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही।
चला करती हूँ दुनिया की रवायत के मुताबिक पर,
दिखे जो कोई तेरा सा मंज़र, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही।
सुलगती धूप में चलती हूँ मंज़िल की तरफ़ लेकिन,
मिले जो तेरी यादों का शजर, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही।
ज़माने की तड़प, ये भाग-दौड़ और ये शोर-ओ-गुल,
मगर जब बात आए तुम पर, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही।
न जाने कौन सी चाहत मुझे रुकने पे कहती है,
उठा कर आसमाँ पर अपनी नज़र, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही।
किताब-ए-ज़िन्दगी के पन्ने मैं पलटती तो हूँ राना,
मगर वो नाम आ जाए जहाँ पर, ठहर जाती हूँ बस ऐसे ही।