बस जीते रहना गुनाह है
कविता पार्ट1
बस जीते रहना गुनाह है
बिना अर्थ के
बस सांस लेना गुनाह है
बिना वजह से
बस चलते रहना गुनाह है
बिना राहा के
बस तुम भटक जाओगे बिना चाहा के
मंजिल नहीं पता मान
सफर के बारे में कुछ नहीं जानते जाना
बस जिना क्यों है यह सोचो
सांस लेना क्यों यह सोचो
चलना क्यों है यह सोचो
किसी और की बताई हुई सफर पर चलने से अच्छा है
तुम जरा थम कर
सांस लो और सोचो
सोचो तुम तुम्हारे पास क्या है
और तुम्हें दूसरों से क्या मिला है
और अगर तुम्हारे पास सब कुछ है
और सब कुछ तुम्हें दूसरों ने दिया है
तो
फिर भी सोचो
तुम तुम्हारे पास ऐसा क्या है
जो बस तुम्हारा है
पलके खोलो और जरा गौर से सोचो तुम
बिना सोचे जिंदगी गुजार देना गुनाह है
और इस गुनाहों से बचो तुम
भलो तुम्हें लगता होगा कि
तुम्हें दर्द नहीं हो रहा
यूं ही जीने से
पर यकीन मानो तुम्हें दर्द हो रहा है
और तुम्हारे दर्द तुम्हारी तक सीमित नहीं रहेंगे
वह दूसरों को भी दर्द देंगे
इसीलिए जीने की वजह ढूंढो तुम
बिना अर्थ के जीना
बस जिंदा रहना है
सांस लेना है
जिंदा दिली भरी जिंदगी नहीं
तुम दूसरों को दर्द दो
अपने साथ-साथ उन्हें भी पछतावे में डालो
इससे अच्छा है कि तुम खुद को संभालो
और सोचो
क्या सच में तुम्हें यही जिंदगी चाहिए
हां तुम वक्त निकाले और सोचो
क्या तुम अपने साथ-साथ
अपने आने वाले पिड़यो को
भी बस सांस लेना सीखना चाहती हो
जरा सोचो तुम खुद के लिए क्या हो
माना कि तुम राजा हो अपने घर के लाडला बेटा
माना कि तुम महारानी हो अपने ससुराल के
पर जरा सोचो तुम खुद क्या हो
क्या वह हो तुम जो खुद से बिना शर्म के
हर वक्त नज़रे मिलाकर गर्भ से कह सकता है
या मैं हूं
क्या तुमने खुद कुछ ऐसा काम क्या है
जिसे अपने सीने से लगाते हुए तुम यह कह सकते हो
यह मेरी अपनी है
और इस पर किसी दूसरे का हक नहीं
जरा सोचो अपने दिन को ऐसे ही व्यर्थ करना गुनाह है